Local & National News in Hindi
ब्रेकिंग
Supreme Court on Fake News: 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की जानकारी स्वीकार नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी ... Delhi Mayor Election 2026: बीजेपी ने प्रवेश वाही को बनाया मेयर उम्मीदवार, AAP के चुनाव न लड़ने से जी... West Bengal Elections: मुर्शिदाबाद में मतदान के दौरान भयंकर हिंसा, TMC और हुमायूं कबीर के समर्थकों क... Supreme Court on I-PAC Raid: 'इससे राष्ट्रपति शासन की स्थिति पैदा हो सकती है', आई-पैक रेड मामले पर S... West Bengal Elections: 'झालमुड़ी मैंने खाई, झटका TMC को लगा', वोटिंग के बीच बंगाल में बोले PM मोदी; ... Bengaluru: आईफोन फैक्ट्री के टॉयलेट में लड़की बनी मां, बच्चे को जन्म देते ही रेता गला; रोंगटे खड़े क... पटना में गजब का फ्रॉड! रसगुल्ला खिलाकर हड़प ली करोड़ों की जमीन, न्याय की गुहार लेकर डिप्टी CM सम्राट... पति के दोस्त संग रचाई शादी, फिर WhatsApp स्टेटस लगाकर किया ऐलान; देखकर पति के उड़े होश, 2 साल पहले ह... शादी में खूनी खेल! नेग में मांगे ₹11000, दूल्हे के पिता ने मना किया तो किन्नरों ने चला दी गोलियां; प... Nashik TCS News: नासिक टीसीएस में महिला कर्मचारी का उत्पीड़न, धर्मांतरण के दबाव और टॉर्चर पर पीड़िता...

Supreme Court on Fake News: ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की जानकारी स्वीकार नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी खबरों और अफवाहों पर दिखाई सख्ती

3

सबरीमाला रेफरेंस सुनवाई के आठवें दिन न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने कहा कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से मिली जानकारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता. यह टिप्पणी वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल के इस निवेदन के जवाब में की गई कि ज्ञान और बुद्धिमत्ता को स्रोत की परवाह किए बिना स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है. कौल ने एक अखबार में डॉ. शशि थरूर द्वारा लिखे गए लेख का हवाला दिया था, जिसमें धार्मिक राहत के मामलों में न्यायिक संयम बरतने की अपील की गई थी.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि हालांकि न्यायालय सभी प्रख्यात लेखकों और विचारकों का सम्मान करता है, लेकिन यह लेख अंततः एक व्यक्तिगत राय है और व्यक्तिगत राय तो व्यक्तिगत राय ही होती है, यह संकेत देते हुए कि इसका न्यायालय पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं हो सकता. कौल ने उत्तर दिया कि सभी स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करने में कोई बुराई नहीं है. यदि ज्ञान और बुद्धिमत्ता किसी भी स्रोत, किसी भी देश, किसी भी विश्वविद्यालय से आती है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. हम एक सभ्यता के रूप में इतने समृद्ध हैं कि हम ज्ञान और सूचना के सभी रूपों को स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सकते.

‘किसी धार्मिक संप्रदाय का अधिकार हमेशा सर्वोपरि रहेगा, ये नहीं कहा जा सकता’

इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से नहीं. मैं इस पर चर्चा नहीं कर रही हूं. मैं इस बात पर ध्यान नहीं दे रही हूं कि कौन सी यूनिवर्सिटी अच्छी है या बुरी, जो इस बहस के लिए वास्तव में अप्रासंगिक है. यह जस्टिस नागरत्ना ने तब कहा, जब कौल ने कहा कि मुद्दा सिर्फ इतना है कि ज्ञान और सूचना जहां से भी आए, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए. कौल दाऊदी बोहरा समुदाय के मुखिया की ओर से बहिष्कार की प्रथा को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका में पेश हो रहे हैं.

कौल ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 26(ख) के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों को सभी संदर्भों में अनुच्छेद 25(2)(ख) के अनुसरण में राज्य द्वारा अपनाए गए सामाजिक सुधार कानूनों के अधीन नहीं माना जा सकता. उन्होंने कहा कि देवरू फैसले में यह सामान्य नियम नहीं दिया गया है कि अनुच्छेद 26(घ) सभी संदर्भों में अनुच्छेद 25(2)(ख) के अधीन हो, जैसा कि यह मामला केवल मंदिर प्रवेश के संदर्भ में था. उन्होंने अनुच्छेद 26(ख) और 25(2)(ख) के सामंजस्यपूर्ण अर्थ निकालने की वकालत की.

इस बिंदु पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि जब अनुच्छेद 25(2)(ख) के तहत कोई कानून बनाया जाता है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि किसी धार्मिक संप्रदाय का अधिकार हमेशा सर्वोपरि रहेगा. वे अधिकार स्वयं सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन हैं. यही सामाजिक सुधार या सामाजिक कल्याण कानून का आधार बन सकता है. कौल ने इस बात से सहमति जताई.

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.

Don`t copy text!