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LPG संकट ने याद दिलाए ‘मिट्टी के चूल्हे’! रांची के बाजारों में मिट्टी और लकड़ी के चूल्हों की भारी मांग; घरों में सुलगने लगी आंच

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रांची:एलपीजी सिलेंडर की किल्लत के बीच रांची की रसोइयों में एक बार फिर पुरानी यादें ताजा होती नजर आ रही हैं. वो दौर, जब हर घर के आंगन में मिट्टी का चूल्हा सुलगता था, अब फिर लौटता दिख रहा है. फर्क बस इतना है कि अब ये वापसी मजबूरी में हो रही है.

चूल्हे की मांग तेजी से बढ़ी

राजधानी रांची के बाजारों में इन दिनों कोयला और लकड़ी से चलने वाले चूल्हों की मांग तेजी से बढ़ी है. 250 से लेकर 1400 रुपये तक की कीमत में उपलब्ध ये चूल्हे हर वर्ग के लोगों की जरूरत पूरी कर रहे हैं. छोटे परिवारों के लिए साधारण चूल्हे तो होटल और ढाबा संचालकों के लिए बड़े और मजबूत चूल्हों की खरीदारी जोरों पर है. कई दुकानों में तो ग्राहकों की भीड़ इतनी बढ़ गई है कि स्टॉक जल्दी खत्म हो जा रहा है.

अलग-अलग वैरायटी के चूल्हे

इन चूल्हों की खासियत सिर्फ उनकी उपयोगिता नहीं, बल्कि उनका निर्माण भी है. लोहे की चादर और स्टील की बाल्टियों को काटकर कारीगर नए-नए डिजाइन के चूल्हे तैयार कर रहे हैं. स्थानीय बाजारों में इनकी अलग-अलग वैरायटी मौजूद है, जो खरीदारों को आकर्षित कर रही है. कारीगरों के हाथों की यह कारीगरी अब फिर से जीवंत हो उठी है. कई कारीगर बताते हैं कि पहले यह काम लगभग बंद हो चुका था, लेकिन अब अचानक मांग बढ़ने से उन्हें फिर रोजगार मिलने लगा है.

चूल्हे की बिक्री में खासा बढ़ोतरी

विक्रेताओं की मानें तो पिछले कुछ दिनों में चूल्हों की बिक्री कई गुना बढ़ गई है. हर दिन ग्राहक आ रहे हैं, कोई छोटा चूल्हा मांग रहा है तो कोई बड़ा. दुकानदार बताते हैं खासकर होटल और रेस्टोरेंट चलाने वाले लोग बड़े चूल्हों की मांग कर रहे हैं, जबकि घरों के लिए छोटे और किफायती विकल्प ज्यादा बिक रहे हैं. कुछ दुकानदार तो ग्राहकों की जरूरत के हिसाब से कस्टमाइज्ड चूल्हे भी तैयार कर रहे हैं.

बाजार में स्मोकलेस चूल्हे भी उपलब्ध

हालांकि, शहर के फ्लैट और अपार्टमेंट में रहने वालों के लिए मिट्टी के चूल्हे का विकल्प आसान नहीं है. पारंपरिक चूल्हों से निकलने वाला धुआं परेशानी का कारण बनता है. ऐसे में बाजार ने इसका समाधान भी निकाल लिया है. ‘स्मोकलेस’ यानी कम धुआं देने वाले चूल्हे भी अब उपलब्ध हैं. हालांकि उनकी कीमत सामान्य चूल्हों से थोड़ी अधिक है. फिर भी लोग मजबूरी में इन्हें खरीद रहे हैं, ताकि रोजमर्रा की रसोई प्रभावित न हो.

शिकायत के बावजूद नहीं होती है सुनवाई

चूल्हों की बढ़ती मांग के पीछे सबसे बड़ी वजह एलपीजी सिलेंडर की कमी है. कई उपभोक्ता बताते हैं कि घंटों लाइन में लगने के बावजूद उन्हें सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है. एक उपभोक्ता ने बताया कि उन्होंने दो हफ्ते पहले गैस बुकिंग की थी, लेकिन अब तक सिलेंडर नहीं मिला. शिकायतों के बावजूद समाधान नहीं मिलने से लोग अब चूल्हा खरीदने को मजबूर हो रहे हैं. कुछ परिवारों ने तो एहतियात के तौर पर गैस के साथ-साथ लोहा और टिन निर्मित चूल्हा भी रखना शुरू कर दिया है.रांची के बाजारों में बिकते ये चूल्हे सिर्फ बदलाव नहीं, बल्कि हालात की कहानी भी बयां कर रहे हैं. यह उस बदलाव का संकेत है, जहां आधुनिकता के बीच भी परंपरा फिर से अपनी जगह बना रही है. अब देखना यह है कि हालात सुधरने के बाद ये चूल्हे फिर बुझ जाते हैं या हमेशा के लिए रसोई का हिस्सा बन जाते हैं.

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