Datia Forest Fire: दतिया के आदिवासी डेरा में जंगल की आग का तांडव; 12 घर जलकर खाक, खुले आसमान के नीचे आए परिवार
दतिया: मध्य प्रदेश के दतिया जिले से एक बेहद हृदयविदारक और दुखद घटना सामने आई है, जहाँ जंगल की भीषण आग ने एक पूरी गरीब बस्ती के 12 घरों की खुशियों को पलभर में राख के ढेर में तब्दील कर दिया। घटना दतिया के वार्ड क्रमांक-1 में स्थित आदिवासी डेरा की है, जहाँ अचानक भड़की आग ने कई परिवारों की जिंदगी को पूरी तरह से तबाह कर दिया। खुफिया और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, आग पहले पास के घने जंगल में लगी थी, लेकिन तेज गर्मी और भीषण हवाओं के थपेड़ों के साथ यह देखते ही देखते आदिवासी बस्ती तक आ पहुंची। आग का वेग इतना तीव्र था कि असहाय ग्रामीणों को अपने घरों से कीमती सामान, अनाज और कपड़े तक निकालने का न्यूनतम समय भी नहीं मिल सका।
अगली सुबह जब प्रशासनिक अधिकारी और पीड़ित लोग जले हुए मकानों के खंडहरों के बीच पहुंचे, तो वहां हर तरफ सिर्फ काली राख, सुलगता धुआं और भयंकर बर्बादी का मंजर दिखाई दे रहा था। कोई बेबस मां अपने बच्चों की स्कूल की किताबें और जरूरी दस्तावेज (जैसे वोटर आईडी, राशन कार्ड) राख के ढेर में रोते हुए तलाश रही थी, तो कोई अपने बच्चों के तन ढकने के कपड़े ढूंढ रहा था। इस भयानक त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू यह रहा कि कई घरों में पालतू पशु और पिंजरों में बंद मासूम पक्षी भी आग की लपटों से खुद को बचा नहीं पाए और जिंदा जलकर मर गए।
👰 विकलांग मां के आंखों के आंसू नहीं हो रहे कम: वर्षों की मेहनत से बेटी की शादी के लिए जोड़ा सामान और पैसा हुआ स्वाहा
इस भीषण अग्निकांड में सबसे बड़ा वज्रपात विकलांग माया आदिवासी के परिवार पर हुआ है, जिनकी आंखों से आंसुओं का सैलाब थमने का नाम नहीं ले रहा है। बिलखते हुए माया ने प्रशासनिक अधिकारियों को बताया कि उनकी युवा बेटी की शादी तय हो चुकी थी। एक विकलांग मां होने के बावजूद उन्होंने पिछले कई वर्षों से पेट काटकर, तिनका-तिनका जोड़कर बेटी के फेरों के लिए शादी का जरूरी सामान, जेवर और कुछ नकदी जमा की थी। लेकिन किस्मत की इस क्रूर आग ने उनकी बरसों की मेहनत और बेटी के सुनहरे सपनों को महज कुछ ही मिनटों में जलाकर पूरी तरह कोयला बना दिया।
💧 पानी की भारी किल्लत और बिजली न होने से थमी ग्रामीणों की कोशिशें: बोरवेल भी नहीं आ सके काम, हालात हुए बेकाबू
स्थानीय पीड़ित निवासी बलवंत आदिवासी के मुताबिक, आग की शुरुआत पहले दूर जंगल की सूखी झाड़ियों में हुई थी, लेकिन हवा का रुख बस्ती की तरफ होने के कारण चिंगारियां उड़कर डेरा के झोपड़ों और कच्चे मकानों की छतों पर आ गिरीं। आग लगते ही पूरे गांव में चीख-पुकार मच गई और ग्रामीणों ने अपनी जान जोखिम में डालकर पारंपरिक स्तर पर कुओं और बर्तनों से पानी डालकर आग बुझाने का भरसक प्रयास किया।
लेकिन भीषण गर्मी में पानी की भारी किल्लत और उचित संसाधनों की कमी के चलते बेकाबू आग पर काबू पाना नामुमकिन साबित हुआ। आक्रोशित ग्रामीणों का यह भी कहना है कि उनके इलाके में लंबे समय से स्थायी बिजली व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण गांव में मौजूद बोरवेल भी समय पर चालू नहीं किए जा सके। यदि बिजली होती तो बोरवेल चलाकर पानी की बौछारों से कम से कम आधे घरों को सुरक्षित बचाया जा सकता था।
🚒 दमकल विभाग और प्रशासन की सुस्ती पर फूटा जनता का गुस्सा: रात 10 बजे पहुंची फायर ब्रिगेड, मुआवजे की गुहार
इस दर्दनाक हादसे के बाद अब स्थानीय जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली और आपातकालीन सेवाओं पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। बेघर हुए आदिवासियों का सीधा और तीखा आरोप है कि आग लगते ही उन्होंने कई बार फोन करके आपातकालीन नंबर डायल-112 और दमकल केंद्र को लाइव लोकेशन के साथ सूचना दी थी, लेकिन प्रशासनिक अमला गहरी नींद में सोया रहा।
ग्रामीणों के मुताबिक, जब रात करीब 10:00 बजे फायर ब्रिगेड की गाड़ियां घटना स्थल पर पहुंचीं, तब तक हवा के झोंकों के कारण अधिकांश पक्के और कच्चे आशियाने पूरी तरह जलकर राख हो चुके थे। इस समय प्रभावित पीड़ित परिवार छोटे-छोटे बच्चों को लेकर खुले आसमान के नीचे, भूखे-प्यासे रहने को पूरी तरह मजबूर हैं। पीड़ित परिवारों ने राज्य सरकार और जिला कलेक्टर से मांग की है कि उन्हें तुरंत रहने के लिए अस्थायी टेंट, भोजन और हुए भारी नुकसान का उचित मुआवजा (Relief Fund) जल्द से जल्द मुहैया कराया जाए।
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