INDORE,IDA में लोकसूचना बना मज़ाक, व्यापक जनहित की बात, सैलेरी-संपत्ति का ब्यौरा देने में बहानेबाजी! लोकसेवक को जनता के पैसों से भुगतान, फिर भी तत्कालीन संपदा अधिकारी मनीष श्रीवास्तव बता रहे निजी!
INDORE, इंदौर विकास प्राधिकरण,लोकसूचना की कारस्तानी,व्यापक जनहित की बात, लोकसेवक की संपत्ति और वेतन की जानकारी देने से IDA क्यों कर रहा इनकार? सैलेरी संपत्ति का भुगतान होता है, जनता के पैसों से,आरटीआई में तीसरी पार्टी का बनाया बहाना, टाला जा रहा तत्कालीन संपदा अधिकारी मनीष श्रीवास्तव की जानकारी देने में।

✍️अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत लोकसेवकों की संपत्ति और वेतन से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक करने को लेकर कानूनी और प्रशासनिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। दरअसल इंदौर विकास प्राधिकरण में तत्कालीन संपदा अधिकारी मनीष श्रीवास्तव को लेकर उक्त विवाद उपजा हैं। क्योंकि पूर्व लोकसूचना अधिकारी सुनील माहेश्वरी की तर्ज पर एक बार फिर IDA लोकसूचना विभाग ने एक ऐसी जानकारी देने में पल्ला झाड़ा है या फिर सीधे कहे तो विवादित संपदा अधिकारी मनीष श्रीवास्तव को लेकर पर्दा डालने की कोशिश की गई हैं। दरअसल हाल ही में सामने आए इंदौर विकास प्राधिकरण में पदस्थ और तत्कालीन विवादित संपदा अधिकारी मनीष श्रीवास्तव जो कि लोकसेवक हैं और उनको जनता से अर्जित की गई राशि से ही सैलरी ,सहित तमाम सुविधाएं दी जाने के बावजूद भी संबंधित जानकारी मांगे जाने पर उन्होंने 26 मार्च 2026 को लिखित में आपत्ति दर्ज कराई कि “मेरी जानकारी नहीं दी जावे”। विभाग ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) का हवाला देते हुए इसे ‘व्यक्तिगत जानकारी’ मानकर रोकने तक का प्रयास किया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या एक लोकसेवक अपनी आय, बच्चों और पत्नी के नाम से दर्ज संपत्तियों के विवरण को “निजी” कहकर छुपा सकता है? इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश और आरटीआई कानून के प्रावधान बेहद स्पष्ट रुख अपनाते हैं।

ऑनलाइन सार्वजनिक करने का है प्रावधान।
लोकसेवक का वेतन: यह पूरी तरह सार्वजनिक जानकारी है
आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b)(x) के तहत प्रत्येक सरकारी विभाग के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपने सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को मिलने वाले मासिक वेतन (Monthly Remuneration) और भत्तों का विवरण स्वतः (Sua Motu) अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करे।
जबकि IDA लोकसूचना विभाग की असलियत यह!

कानूनी स्थिति: वेतन सरकारी खजाने (Public Funds) से दिया जाता है, इसलिए इसे किसी भी स्थिति में ‘निजी जानकारी’ नहीं माना जा सकता। आम व्यक्ति को अधिकार है कि कोई भी नागरिक यह जानने का हकदार है कि एक लोकसेवक को अभी तक कुल कितना वेतन और एरियर मिला है। विभाग इसे धारा 8(1)(j) के तहत नहीं छुपा सकता।
लोकसेवक और परिवार की संपत्ति: क्या यह ‘तीसरी पार्टी’ की निजी जानकारी है?

आमतौर पर, सरकारी कर्मचारियों की अचल संपत्ति (Immovable Property Returns – IPR) को लोकहित के दायरे में देखा जाता है। केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और विभिन्न राज्यों के सेवा नियमों के अनुसार, लोकसेवकों को हर साल अपनी, अपनी पत्नी और आश्रित बच्चों की संपत्ति का ब्योरा विभाग को सौंपना होता है।
जब कोई नागरिक आरटीआई के तहत यह ब्योरा मांगता है, तो मामला धारा 11 (Third Party Information) के तहत आता है। थर्ड पार्टी की प्रक्रिया कि यदि मांगी गई जानकारी किसी अन्य व्यक्ति मनीष श्रीवास्तव या उनकी पत्नी से संबंधित है, तो जन सूचना अधिकारी (PIO) उन्हें नोटिस भेजकर उनकी सहमति या असहमति मांगता है,जैसा कि इस मामले में किया गया अंतिम निर्णय पीआईओ का तीसरी पार्टी (लोकसेवक) द्वारा इनकार कर देने मात्र से आरटीआई आवेदन खारिज नहीं हो जाता। आरटीआई कानून साफ कहता है कि यदि सूचना देने में ‘व्यापक जनहित’ (Larger Public Interest) शामिल है, तो पीआईओ को तीसरी पार्टी की आपत्ति को दरकिनार करके भी जानकारी देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट का नजरिया

जनहित बनाम निजता
सुप्रीम कोर्ट ने ‘गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम केंद्रीय सूचना आयुक्त’ और ‘सुभाष चंद्र अग्रवाल’ मामलों में माना था कि सरकारी कर्मचारी की संपत्ति और आयकर रिटर्न ‘निजी जानकारी’ के दायरे में आते हैं। लेकिन कोर्ट ने इसके साथ एक मजबूत शर्त जोड़ी थी: यदि आवेदक यह साबित कर दे कि लोकसेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत है, आय से अधिक संपत्ति का मामला है, या इस जानकारी को उजागर करने में कोई बड़ा सार्वजनिक हित (Public Interest) छुपा है, तो यह जानकारी अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए।
आवेदक करेंगे अपील।

मनीष श्रीवास्तव के इनकार को आधार बनाकर सूचना देने से मना किया गया हैं। लिहाजा अब आवेदक के पास मजबूत कानूनी विकल्प मौजूद हैं चर्चा में आवेदक ने कहा कि वह अब प्रथम अपील (First Appeal) दर्ज कर रहे हैं। आवेदक को विभाग के वरिष्ठ अधिकारी (First Appellate Authority) अपील में यह तर्क है कि लोकसेवक का वेतन और संपत्ति का ब्योरा पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए ‘व्यापक जनहित’ के दायरे में आता है। संसद और विधानसभा की कसौटी का उपयोग: धारा 8(1)(j) के अंत में एक महत्वपूर्ण प्रावधान (Proviso) है: “वह जानकारी जिसे संसद या राज्य विधानमंडल को देने से इनकार नहीं किया जा सकता, उसे किसी नागरिक को देने से भी इनकार नहीं किया जाएगा।” चूंकि सरकारी कर्मचारियों की संपत्ति की जानकारी विधानसभा या संसद में मांगी जा सकती है, इसलिए इसे नागरिक को भी मिलना चाहिए।