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UCC Row: यूनिफॉर्म सिविल कोड के खिलाफ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती देने का किया ऐलान

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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने गुजरात विधानसभा से पारित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि इसके माध्यम से बहुसंख्यकों की सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को थोपने का प्रयास किया गया है जो मुस्लिम समुदाय को अस्वीकार्य है. बोर्ड के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास और कुछ अन्य पदाधिकारियों ने यह भी कहा कि इस प्रस्तावित काननू को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी.

गुजरात विधानसभा ने धर्म से परे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप को रेगुलेट करने के लिए एक समान कानूनी ढांचा स्थापित करने के उद्देश्य से लाए गए समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को बीते 24 मार्च को मंजूरी दी.

उत्तराखंड में कानून लागू

इस विधेयक में बलपूर्वक, दबाव डालकर या धोखाधड़ी से किए गए विवाह के लिए सात वर्ष के कारावास की सजा का प्रावधान है. साथ ही बहुविवाह पर भी रोक लगाई गई है. इसके अलावा, इसमें विवाह और लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन कराना भी अनिवार्य किया गया है. इसी तरह का एक कानून उत्तराखंड में लागू हो चुका है.

नागरिक स्वतंत्रता का मौलिक उल्लंघन

इलियास ने कहा कि हाल ही में गुजरात विधानसभा द्वारा पारित और पहले उत्तराखंड में लागू तथाकथित समान नागरिक संहिता संवैधानिक रूप से त्रुटिपूर्ण, कानूनी रूप से अस्थिर और धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक स्वतंत्रता का मौलिक उल्लंघन है. बोर्ड ने एक बयान में कहा कि यूसीसी का जिक्र संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य के नीति निर्देशक तत्व के रूप में किया गया है, जो मौलिक अधिकारों की तरह सीधे लागू करने योग्य नहीं है.

उन्होंने कहा कि गुजरात का प्रस्तावित कानून न तो देश भर में लागू होता है और न ही राज्य के भीतर समान रूप से लागू होता है, क्योंकि अनुसूचित जनजातियों और अन्य संवैधानिक रूप से संरक्षित समुदायों को छूट दी गई है. इस कानून को वास्तविक समान नागरिक संहिता के रूप में वर्णित नहीं किया जा सकता है. कानून का नाम भ्रामक है.

नागरिकों पर ऐसा कानून नहीं थोपा जाएगा

बोर्ड के पदाधिकारियों का कहना था कि संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से आश्वासन दिया था कि जनता की सहमति के बिना नागरिकों पर ऐसा कोई कानून नहीं थोपा जाएगा. उनके अनुसार, 21वें और 22वें दोनों विधि आयोगों ने इस मुद्दे पर जनता की राय मांगी थी, और बाद में पाया कि मौजूदा परिस्थितियों में यूसीसी आवश्यक नहीं था.

राज्य लागू नहीं करेंगे यूसीसी का नियम

बोर्ड के प्रवक्ता ने कहा कि अंबेडकर साहेब ने कहा था कि यूसीसी का नियम राज्य लागू नहीं करेंगे. ये बिल ऐसे समय लाया गया है जब कई राज्यों में चुनाव है. उन्होंने कहा कि क़ुरान में जब हमारे सारे रीतिरिवाज लिखे हुए हैं तो हमारे लिए कानून क्यों बनाए जा रहे हैं.

धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन

बोर्ड ने दावा किया कि गुजरात के प्रस्तावित कानून को अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर मुसलमानों पर बहुसंख्यकवादी सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को थोपने का प्रयास है. उनका कहना था, विवाह, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार और पारिवारिक कानून जैसे मुद्दे इस्लामी धर्मशास्त्र और धार्मिक परिपाटी के अभिन्न अंग हैं, और इन मामलों में सरकार का हस्तक्षेप धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है.

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड और गुजरात दोनों में यूसीसी के कार्यान्वयन को तत्काल रोका जाना चाहिए. पारिवारिक कानूनों में भविष्य में कोई भी सुधार संवैधानिक गारंटी और उचित कानूनी ढांचे के भीतर सभी हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श के माध्यम से ही किया जाना चाहिए.

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