INDORE,नगर निगम नामांतरण घोटाला,जांच में लीपापोती! तकनीकी साक्ष्यों को किया दरकिनार,छोटी मछली को मिली सजा,रडार से बाहर बड़ी मछली,मिल गई क्लीन चिट,जांच समिति पर उठ रहे सवाल।
नगर निगम नामांतरण घोटाला,जांच में लीपापोती,तकनीकी साक्ष्यों के बिना,हो गई जांच,जबकि बड़ी मछली अभी भी रेडार से बाहर,अभी भी एक ही सवाल, साइबर क्राइम की पड़ताल मेन्युअल संभव नहीं।

✍️अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर।
इंदौर नगर निगम में फिलहाल घोटालों का पिटारा खुला हुआ हैं। लेकिन निगम अधिकारी इस पिटारे में से निकले घोटालों को दबाने की हरसंभव कोशिशें कर रहे हैं। लेकिन समझने वाले समझ रहे है कि यह मात्र औपचारिकताएं है,न कि दोषियों को सजा दिलाने की पहल। क्योंकि हाल ही में इंदौर नगर निगम में हुए नामांतरण घोटाले को लेकर अब ऐसे ही तथ्य सामने आ रहे हैं। जो इंदौर नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल की जांच समिति पर ही सवालिया निशान उठा रहे हैं। दरअसल वह इसलिए कि निगम अधिकारियों ने ये माना कि 356 खातों में नामांतरण को लेकर हेरफर हुआ है। लेकिन उक्त मामले में जिन्हें नापा गया वह मात्र छोटी मछली बताई जा रही हैं। जबकि जांच समिति सदस्यों जिनमें निगम के ही तीन अपर आयुक्त आकाश सिंह,अर्थ जैन, सहित अन्य सदस्य ने की हैं।

मुख्यालय ARO, उपायुक्त को क्लीन चिट क्यों?

नामांतरण घोटाले में मुख्यालय ARO मयूर पाटिल,राजस्व विभाग उपायुक्त केशव सगर, उपायुक्त प्रदीप जैन को क्लीन चिट मिलना किसी को हजम नहीं हो रहा हैं। क्योकि लॉगिन आईडी पासवर्ड इनके ही उपयोग किए गए हैं। लेकिन उक्त इतने बड़े घोटाले में सिर्फ आउटसोर्स कर्मचारियों,बिल कलेक्टर,को नपना जांच में लीपापोती को स्पष्ट दर्शित करता हैं।

पूरी जांच पर सवाल,नहीं जुटाये तकनीकी साक्ष्य।

नामांतरण घोटाला तब से उजागर हुआ हैं। तभी से मांग उठ रही है कि उक्त मामले की साइबर क्राइम पुलिस से जांच करवाई जानी चाहिए। यही नहीं उक्त घोटाले को अंजाम ही तकनीकी तरीके से दिया हैं। लिहाजा मेन्युअल तरीके से उक्त मामले की जांच होने संभव ही नहीं हैं। क्योंकि समिति सदस्यों ने तकनीकी साक्ष्य जुटाए ही नहीं हैं। और तो और कौन कौन से कंप्यूटर सिस्टम से इन फर्जी नामांतरण को अंजाम दिया गया। वह भी अभी तक जांच में स्पष्ट नहीं किया गया है।

जबरन नप गए कुछ तो।

बताया जा रहा है कि बिल कलेक्टर सौरभ तिवारी द्वारा एक नामांतरण किया गया था। उक्त नामांतरण में पति की बजाय पत्नी शब्द उल्लेखित हो गया था। उक्त मानवीय भूल को लेकर किसी की आपत्ति भी नहीं आई। लेकिन इस मामले में सौरभ तिवारी की सेवाएं समाप्त कर दी। जबकि बड़ी मछलियों को जांच से बाहर रखते हुए क्लीन चिट दे दी गई।

मुख्यालय ARO की भूमिका संदिग्ध,लेकिन कार्यवाही नहीं।
नामांतरण घोटाले में निगम मुख्यालय ARO मयूर पाटिल की भूमिका काफी ज्यादा संदिग्ध हैं। क्योंकि कार्यकाल के दौरान उनके द्वारा लॉगिन, आईडी,पासवर्ड जनरेट नहीं करना और दूसरी आईडी पर ही काम निपटाना भी दर्जनों सवाल खड़े कर रहा हैं। लेकिन फिर भी जांच समिति सदस्यों द्वारा क्लीन चिट दे देना बड़ा सवाल हैं।

उपायुक्त की मर्जी ,जानकारी के बिना असंभव।
उक्त मामले में राजस्व उपायुक्त प्रदीप जैन,और केशव सगर को क्लीन चिट दे दी गई। लेकिन उक्त नामांतरण प्रक्रिया में इन दोनों ही अधिकारियों की जानकारी के बिना और मर्जी के इतने बड़े कांड को अंजाम देना असंभव है। लेकिन फिर भी इन्हें क्लीन चिट मिलना जांच समिति पर ही सवाल खड़े कर रही हैं।

कुख्यात होता जा रहा निगम राजस्व विभाग।

पिछले कई महीनों से निगम का राजस्व विभाग जिसके अपर आयुक्त आकाश सिंह हैं। और निगम महापौर परिषद सदस्य निरंजन सिंह चौहान है। दिन प्रतिदिन कुख्यात और बदनाम विभागों में शुमार हो रहा हैं। यहां के एक के बाद एक काले चिट्ठे उजागर हो रहे हैं।