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INDORE, आईडीए,RTI या मजाक,अपील में आदेश के बावजूद 10 दिन बीत नहीं रहे,बाबू गिरीश हलवे की नाफरमानी,मिलीभगत के भी आरोप!

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इंदौर विकास प्राधिकरण, RTI या मज़ाक?अपील में आदेश, बाबू की ‘नाफरमानी’, क्लर्क गिरीश हलवे पर मिलीभगत के आरोप!

✍️ अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर।

IDA की संपदा शाखा में सूचना के अधिकार RTI कानून को ताक पर रखने और अफसरों के आदेशों को हवा में उड़ाने का एक गंभीर मामला सामने आया है। प्रथम अपीलीय अधिकारी के स्पष्ट आदेश के बावजूद संपदा शाखा के क्लर्क (बाबू) गिरीश हलवे द्वारा जानकारी देने में लगातार आनाकानी की जा रही है, जिससे पूरी सरकारी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

IDA की संपदा शाखा से ‘स्कीम 78’ के एक भूखंड के संबंध में जानकारी मांगी गई थी। यह भूखंड ‘विद्या विजय बाल मंदिर’ को आवंटित किया गया था। इस आवंटन प्रक्रिया से जुड़े समस्त महत्वपूर्ण दस्तावेजों को RTI के तहत मांगा गया था।
शुरुआत में ‘तृतीय पक्ष’ (Third Party) का बहाना बनाकर इस जानकारी को रोकने का प्रयास किया गया। जब मामला प्रथम अपील में पहुंचा, तो लोक सूचना अधिकारी ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट आदेश जारी किया कि 10 कार्यदिवस के भीतर विद्या विजय बाल मंदिर से संबंधित समस्त कागजात ‘निःशुल्क’ (Free of Cost) उपलब्ध कराए जाएं।

 

अफसरों से बड़े हुए बाबू, आदेश के बाद भी टालमटोल

प्रथम अपील में आदेश पारित होने और समय सीमा (10 दिन) बीत जाने के बाद भी संपदा शाखा के क्लर्क गिरीश हलवे द्वारा जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। आवेदक जब भी जानकारी लेने पहुंचता है, तो क्लर्क द्वारा कभी शहर से बाहर होने, कभी छुट्टी पर होने का बहाना बनाया जाता है। हद तो तब हो गई जब क्लर्क द्वारा आवेदकों के फोन उठाना भी बंद कर दिया गया है।


“अफसरों से ज्यादा बाबूओं की दादागिरी”
इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सूचना का अधिकार लगाने वाले एडवोकेट सुनील खंडेलवाल ने कहा:

“इंदौर विकास प्राधिकरण की संपदा शाखा में इस समय अफसरों से ज्यादा बाबूओं की दादागिरी व्याप्त है। जब प्रथम अपील के आदेश में साफ-साफ लिखा है कि 10 दिन के अंदर सारे कागजात निःशुल्क देने हैं, तो एक क्लर्क की इतनी हिम्मत कैसे हो सकती है कि वह आदेश को दबाकर बैठ जाए? कभी छुट्टी का बहाना बनाना तो कभी मोबाइल न उठाना, यह सीधे तौर पर नाफरमानी है। गिरीश हलवे की यह निष्क्रियता और टालमटोल सीधे तौर पर इस पूरे मामले में उनकी मिलीभगत को प्रतीत करती है। अब समय आ गया है कि वरिष्ठ अफसर मूकदर्शक बने रहने के बजाय ऐसे लापरवाह बाबूओं पर सख्त से सख्त दंडात्मक कार्रवाई करें।”

पहले भी विवादों में RTI

यह कोई पहला मामला नहीं है जब IDA में RTI को मज़ाक बनाया गया हो। इससे पहले तत्कालीन संपदा अधिकारी मनीष श्रीवास्तव की निजी संपत्तियों का विवरण मांगने पर भी ऐसा ही किया गया था। ‘तृतीय पक्ष’ का सहारा लेकर उस मामले को इतना टाला गया कि अब वह मामला तीसरी अपील के मुहाने पर खड़ा है। बाबू गिरीश हलवे की इस कार्यशैली ने अब कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या संपदा शाखा का अमला किसी बड़े घोटाले को छुपाने के लिए इस कदर हिचकिचा रहा है?

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