नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिसमें शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) मामले में अग्रिम जमानत दी गई थी। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि फिलहाल अग्रिम जमानत बरकरार रहेगी।
❓ शिकायत दर्ज करने में देरी पर कोर्ट का सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस सुंदरेश ने याचिकाकर्ता से तीखा सवाल किया कि यदि उन्हें नाबालिगों के शोषण की जानकारी थी, तो उन्होंने पुलिस के पास जाने में 6 दिन की देरी क्यों की? गौरतलब है कि शिकायतकर्ता का दावा था कि पीड़ित नाबालिगों ने उन्हें 18 जनवरी, 2026 को घटना की जानकारी दी थी, लेकिन शिकायत 24 जनवरी को दर्ज कराई गई। शिकायतकर्ता ने इसके पीछे खुद को पूजा-यज्ञ में व्यस्त होना बताया था, जिस पर कोर्ट ने संशय जताया।
🏛️ हाई कोर्ट ने भी जताई थी असहमति
अपने 22 पन्नों के आदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी इस बात पर गौर किया था कि शिकायतकर्ता ने 21 जनवरी को एक अलग मामले में शिकायत की थी, लेकिन उसी समय इस गंभीर मामले में देरी की। कोर्ट ने इस आधार पर भी राहत दी कि नाबालिग पीड़ितों ने अपने स्वाभाविक अभिभावकों के बजाय एक अजनबी को जानकारी दी, जिसे कोर्ट ने ‘असामान्य व्यवहार’ माना।
🚫 कानूनी धारणा और मीडिया की दखलंदाजी
बेंच ने POCSO एक्ट की धारा 29 के तहत ‘कानूनी धारणा’ (statutory presumption) के तर्क को गिरफ्तारी से पहले के चरण के लिए खारिज कर दिया। साथ ही, कोर्ट ने इस मामले में मीडिया की अनावश्यक दखलंदाजी और प्रचार पर भी कड़ी आपत्ति जताई है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी कानूनी राहत मिली है, जबकि मामले की आगे की प्रक्रिया जारी रहेगी।
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