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Supreme Court Judgement: सैनिटरी पैड और शौचालय की कमी से पढ़ाई न छोड़ें लड़कियां; सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को सख्त हिदायत

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नई दिल्ली: भारत की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने देश में लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान को लेकर एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान साफ शब्दों में कहा कि देश के किसी भी स्कूल में सैनिटरी नैपकिन (मासिक धर्म स्वच्छता उत्पाद) और छात्राओं के लिए अलग व सुरक्षित शौचालय की सुविधा मुहैया नहीं होने के कारण किसी भी लड़की को अपनी पढ़ाई बीच में नहीं छोड़नी चाहिए। इस अत्यंत संवेदनशील सामाजिक मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह कड़ा निर्देश दिया है कि वह देश के प्रत्येक राज्य में यह सुनिश्चित करे कि अदालत द्वारा पहले जारी किए गए सभी दिशा-निर्देशों का जमीनी स्तर पर सटीक और कड़ाई से अनुपालन (Compliance) किया जाए।

⚖️ न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और आर महादेवन की पीठ का बड़ा निर्देश: महिलाओं के हित में केंद्र उठाए ठोस कदम

दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा बीते 30 जनवरी को दिए गए महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट की यह ताजा टिप्पणी सामने आई है। पूर्व में न्यायालय ने सभी संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन और सरकारी व निजी स्कूलों में पूरी तरह से चालू (फंक्शनल), अलग शौचालय उपलब्ध कराने का कड़ा निर्देश दिया था। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद से ही देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा विभागों में इस दिशा में प्रयास तेज हो गए हैं।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की खंडपीठ ने कहा कि, “प्रशासन को हर हाल में इसका स्थाई फैसला और प्रबंधन करना होगा। यह देश की आधी आबादी यानी महिलाओं और मासूम लड़कियों के मौलिक अधिकारों और उनके उज्ज्वल भविष्य के हित में है।” पीठ ने भावुक होते हुए कहा कि देश की होनहार लड़कियों को केवल मासिक धर्म जैसी प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया के कारण अपनी उच्च शिक्षा नहीं छोड़नी चाहिए और न ही घर पर बैठकर जबरन घरेलू कामकाज में जुटना चाहिए। केंद्र सरकार की ओर से अदालत में पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अर्चना पाठक दवे से पीठ ने सीधे तौर पर कहा कि अब यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है कि आप अपनी प्रशासनिक शक्तियों का भरपूर लाभ उठाएं और यह सुनिश्चित करें कि हमारे इस फैसले के अनुसार देश की अंतिम छोर पर बैठी छात्रा तक इसका लाभ हर हाल में पहुंचे।

❌ बुनियादी सुविधाएं (पानी, साबुन, टॉयलेट) नहीं देने वाले स्कूलों की मान्यता होगी रद्द: 30 जनवरी का ऐतिहासिक फैसला

न्यायालय द्वारा 30 जनवरी को सुनाए गए इस ऐतिहासिक फैसले में देश के भीतर व्यापक ‘लैंगिक न्याय’ (Gender Justice) और ‘शैक्षिक समानता’ सुनिश्चित करने पर बल दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को सख्त निर्देश दिया था कि वे स्कूली छात्राओं को मुफ्त में आसानी से डिस्पोज होने वाले ‘ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन’ (Oxo-Biodegradable Sanitary Napkins) उपलब्ध कराएं। इसके साथ ही स्कूलों के बुनियादी ढांचे को सुधारते हुए सभी छात्रों और विशेषकर छात्राओं के लिए पूरी तरह क्रियाशील, साफ-सुथरे और लिंग-विभेदित (अलग) शौचालयों की व्यवस्था अनिवार्य रूप से करें।

शीर्ष अदालत ने इस बार कानूनी चाबुक चलाते हुए बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि यदि देश का कोई भी सरकारी, सहायता प्राप्त या निजी स्कूल इन न्यूनतम बुनियादी सुविधाओं (साफ पानी, हाथ धोने के लिए साबुन, चालू शौचालय और सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन) को छात्राओं को उपलब्ध कराने में पूरी तरह विफल रहता है, तो शिक्षा बोर्ड द्वारा उस स्कूल की आधिकारिक मान्यता (Affiliation) तक तुरंत प्रभाव से रद्द की जा सकती है।

🩺 बुनियादी सुविधाओं के अभाव में माहवारी के दिनों में स्कूल छोड़ देती हैं छात्राएं: आत्मविश्वास और शैक्षणिक प्रदर्शन हो रहा प्रभावित

अदालत के सामने प्रस्तुत शोध आंकड़ों और सामाजिक वास्तविकताओं के अनुसार, देश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के स्कूलों में उचित स्वच्छता, प्राइवेसी और सुरक्षित पैड बदलने (Pad Disposal) की सुरक्षित जगह न होने के कारण किशोर लड़कियां मासिक धर्म (Periods) के उन विशेष दिनों में स्कूल जाना पूरी तरह बंद कर देती हैं। स्कूलों के भीतर न्यूनतम बुनियादी सुविधाओं के इसी घोर अभाव के चलते माहवारी से जुड़े मानसिक तनाव, सामाजिक शर्मिंदगी और झिझक के कारण देश में हर साल भारी संख्या में छात्राएं अंततः अपनी स्कूल की पढ़ाई को बीच में ही हमेशा के लिए अलविदा कह देती हैं।

कक्षाओं के इस तरह बार-बार छूटने और अनुपस्थिति के कारण लड़कियों का शैक्षणिक प्रदर्शन (Academic Performance) लगातार गिरता जाता है और उनका व्यक्तिगत आत्मविश्वास भी बेहद कमजोर हो जाता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब देश के कई अग्रणी राज्यों के स्कूलों में छात्राओं के लिए मुफ्त सैनिटरी पैड्स और डिस्पोजल मशीनों की आधुनिक व्यवस्था बड़े पैमाने पर शुरू कर दी गई है, जिसे अब पूरे देश में अनिवार्य किया जा रहा है।

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