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Haryana Higher Education: हरियाणा उच्च शिक्षा विभाग का बड़ा फैसला; कॉलेज-यूनिवर्सिटी निरीक्षण कमेटी का आदेश लिया वापस

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चंडीगढ़: हरियाणा के उच्च शिक्षा विभाग से एक बेहद बड़ी प्रशासनिक खबर सामने आ रही है। विभाग ने प्रदेश के सभी सरकारी व निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के औपचारिक निरीक्षण (Formal Inspection) के लिए पूर्व में गठित की गई उच्च स्तरीय कमेटी संबंधी अपने आधिकारिक आदेशों को पूरी तरह से वापस ले लिया है। उच्च शिक्षा विभाग के महानिदेशक की ओर से जारी किए गए नए आधिकारिक पत्र में स्पष्ट किया गया है कि बीती 21 अप्रैल, 2026 को जारी किए गए कमेटी गठन के आदेशों को जनहित और प्रशासनिक कारणों से तत्काल प्रभाव से निरस्त (Cancel) किया जाता है। सरकार के इस यू-टर्न को लेकर राज्य के शैक्षणिक गलियारों में भारी चर्चा बनी हुई है।

📋 बुनियादी सुविधाओं और शिक्षण की गुणवत्ता जांचने के लिए बनी थी कमेटी: शिक्षा मंत्री के पीएस (PS) और पीए (PA) को किया गया था शामिल

दरअसल, उच्च शिक्षा विभाग ने इसी साल अप्रैल महीने में एक विशेष जांच कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी सुविधाओं), लैब्स, फंड्स के सही इस्तेमाल और शिक्षण गतिविधियों की जमीनी गुणवत्ता का बारीकी से निरीक्षण करना था। लेकिन विवाद तब शुरू हुआ जब कमेटी के सदस्यों की सूची जारी की गई। इस कमेटी में माननीय शिक्षा मंत्री के पी.एस. (प्राइवेट सेक्रेटरी) करण सिंह, हरियाणा राज्य उच्च शिक्षा परिषद के सदस्य डॉ. सतरूप ढांडा और शिक्षा मंत्री के पी.ए. (पर्सनल असिस्टेंट) प्रदीप जागलान को मुख्य जांचकर्ता के तौर पर शामिल किया गया था।

🗣️ “स्टाफ के पास कौन सी तकनीकी दक्षता है?”—प्रोफेसरों के भारी विरोध और सोशल मीडिया पर मोर्चे के बाद बदला फैसला

कमेटी की घोषणा होते ही विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसरों, प्रिंसिपलों और शिक्षाविदों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया और सोशल मीडिया पर अपनी आवाज मुखर करने लगे। प्रोफेसरों का सीधा और कड़ा तर्क था कि शिक्षा मंत्री के प्रशासनिक स्टाफ के पास ऐसी कौन सी शैक्षणिक या ‘तकनीकी दक्षता’ (Technical Expertise) है, जिसके आधार पर उन्हें विश्वविद्यालयों के वीसी (VC) और सीनियर प्रोफेसरों के काम की समीक्षा करने के लिए कमेटी में इतनी बड़ी जगह दी गई है?

शिक्षकों में इस बात को लेकर भी भारी आक्रोश था कि उच्च शिक्षा विभाग के किसी भी सीनियर कैडर अधिकारी, वरिष्ठ शिक्षाविद या अनुभवी प्रोफेसर को इस कमेटी में शामिल क्यों नहीं किया गया। सोशल मीडिया से लेकर विभागीय स्तर पर बढ़ते इस भारी विरोध और विवाद को भांपते हुए सरकार और उच्च शिक्षा विभाग ने बैकफुट पर आना ही बेहतर समझा और अंततः अपने इस फैसले को पूरी तरह बदलकर आदेश निरस्त कर दिए।

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