Jabalpur Bargi Dam Tragedy: बरगी डैम में ‘मौत वाला क्रूज’! हादसे की इन तस्वीरों में देखें 9 मौतों की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी
क्योंकि हर तस्वीर कुछ कहती है… कुदरत का कहर जब टूटता है, तो इंसान के पास संभलने का वक्त नहीं होता. लेकिन उस प्रलय और चीख-पुकार के बीच भी अगर कुछ अमर रह जाता है, तो वह है ‘मां की ममता’. जबलपुर के बरगी डैम में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. हादसे में 9 लोगों की मौत हुई है. 28 लोगों का रेस्क्यू किया गया है. अब भी कुछ लोग लापता हैं, जिन्हें ढूंढा जा रहा है. रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान जब आगरा से आई पैरामिलिट्री डाइविंग टीम पानी की गहराइयों में उतरी, तो उनकी आंखों के सामने एक ऐसा मंजर था जिसे देख पत्थर दिल भी पसीज जाए.
हादसे के 14 घंटों बाद, जब गोताखोरों की टीम क्रूज के मलबे के भीतर संकरी गलियों में रास्ता बनाते हुए पहुंची, तो उन्हें दो शव एक साथ मिले. ये शव दिल्ली की रहने वाली जूलियस मेसी और उनकी मासूम बेटी सिया मेसी के थे, डाइविंग टीम के सदस्य ने भारी मन से बताया कि जब वे जूलियस का शव निकालने की कोशिश कर रहे थे, तो शव भारी लग रहा था और हिल नहीं रहा था. गहराई में टॉर्च की हल्की रोशनी में जब उन्होंने करीब जाकर देखा, तो रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य सामने आया.
जूलियस ने अपनी बेटी सिया को सीने से इस कदर सटा रखा था, मानो वह उसे पानी के दैत्य से बचा लेना चाहती हो. मौत के उस खौफनाक मंजर में भी मां ने अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी थी.
पानी के भारी दबाव और मौत की आखिरी हिचकी के बीच भी मां की बाहें अपनी संतान के लिए कवच बनी हुई थीं. रेस्क्यू टीम को उन्हें अलग करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी, क्योंकि ममता का वह बंधन मौत के बाद भी अटूट था.
दिल्ली के खजन बस्ती थाणे से मेसी परिवार और उनके दोस्त एक सुखद छुट्टियों की उम्मीद में जबलपुर आए थे. परिवार के छह सदस्य जूलियस मेसी, सिया मेसी, प्रतिम मेसी, प्रदीप मेसी, मरीना और करण वर्मा बच्चों की जिद पर बरगी डैम घूमने पहुंचे थे. शाम के 4 बजे थे, धूप ढल रही थी और क्रूज पर सवार करीब 40 सैलानी मस्ती के मूड में थे. किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले दो घंटे उनकी जिंदगी के आखिरी पल साबित होने वाले हैं.
हादसे में बचीं संगीता कोरी के बयान ने कई गंभीर लापरवाहियों को उजागर किया है. उनके अनुसार, क्रूज पर सवार किसी भी यात्री को लाइफ जैकेट नहीं पहनाई गई थी, बल्कि जैकेट स्टोर रूम में बंद रखी थीं. जब नाव में पानी भरने लगा तब आनन-फानन में जैकेट बांटने की कोशिश की गई, जिससे अफरा-तफरी और छीना-झपटी मच गई.
संगीता ने यह भी आरोप लगाया कि चालक अनुभवहीन था और किनारे से लोगों के इशारों को नजरअंदाज कर रहा था. इसके साथ ही क्रूज में तय क्षमता से अधिक लोग सवार थे, जिनमें कई बच्चों का कोई रिकॉर्ड तक नहीं था.
आगरा से आई एक्सपर्ट डाइविंग टीम को पानी के अंदर जीरो विजिबिलिटी, मलबे और क्रूज के टूटे ढांचे के बीच काम करना पड़ा. पलटा हुआ क्रूज लोहे की ग्रिल और रॉड्स के कारण एक जाल जैसा बन गया था, जिसमें एक गोताखोर खुद फंस गया था और उसे मुश्किल से बाहर निकाला गया.
टीम को शवों तक पहुंचने के लिए हथौड़ों से क्रूज की बॉडी तोड़नी पड़ी. अब तक पांच शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि आशंका है कि अंदर और भी लोग फंसे हो सकते हैं.
इस हादसे ने प्रशासन और सिस्टम पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. आखिर बिना लाइफ जैकेट के क्रूज को संचालन की अनुमति कैसे मिली? खराब मौसम के बावजूद इसे बीच पानी में क्यों ले जाया गया? क्या सुरक्षा मानकों का पालन सिर्फ कागजों में ही हो रहा था?
बरगी डैम जैसे प्रमुख पर्यटन स्थल पर ऐसी लापरवाही यह दर्शाती है कि कहीं न कहीं जिम्मेदारी से ज्यादा कमाई को प्राथमिकता दी जा रही थी. यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता की कड़वी सच्चाई बनकर सामने आया है.
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