INDORE,निगम कमिश्नर नाप रहे सीमेंट गिट्टी, फिर जनकार्य विभाग की इतनी लंबी फ़ौज सिर्फ ताली बजाने के काम की।
“निगम कमिश्नर खुद नाप रहे सीमेंट गिट्टी, जनकार्य समिति प्रभारी,अपर आयुक्त और इंजीनियरों की लंबी फौज सिर्फ ताली बजाने के काम की ?
“सड़कें तो ‘स्मार्ट’ बन गईं? पर हमारे साहब लोग कब ‘एक्टिव’ होंगे?”

✍️अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर नगर।

इंदौर नगर निगम का जनकार्य विभाग इन दिनों एक अनोखे ‘मौन व्रत’ और ‘विश्राम मोड’ में है। शहर में सड़कों का जाल बिछाने के लिए कागजों पर जनकार्य समिति प्रभारी राजेंद्र राठौड़, अपर आयुक्त अभय राजनगांवकर, जोनवार इंजीनियरों फौज, और अधीक्षण यंत्री की इतनी भारी-भरकम फौज तैनात है कि अगर ये सब एक साथ सड़क पर खड़े हो जाएं, तो ट्रैफिक जाम हो जाए। लेकिन मजाल है कि इनमें से किसी की नजर ठेकेदारों की जादुई करामातों पर पड़ जाए। शायद इसी वजह से अब खुद निगम कप्तान आईएएस और इंदौर नगर निगम कमिश्नर क्षितिज सिंघल को अपने आलीशान दफ्तर की एयर कंडीशनिंग छोड़कर सुबह-सुबह सड़कों की धूल फांकने उतरना पड़ रहा है। फिर चाहे फिर वो वार्ड की सड़कें को या फिर मास्टर प्लान की सड़कें।
जब कप्तान ही बैटिंग करे, तो ‘फील्डर्स’ क्या ताली बजाने के लिए हैं?

शहर में यह सवाल उठ रहा है कि जब खुद निगमायुक्त को हाथ में गिट्टी-डामर लेकर कोर कटिंग करवानी पड़ रही है। तो ज़ोनवार बैठे भारी-भरकम वेतन पाने वाले ‘सुपरवाइज़र और सब-इंजीनियर’ क्या सिर्फ फाइलों पर हरी स्याही चलाने के लिए रखे गए हैं? मास्टर प्लान की सड़कें हों या वार्डों की गलियां, ठेकेदार अपनी मर्जी का सीमेंट, क्रांकिट बिछाकर निकल जाते हैं। और हमारे मैदानी अमले को सब ‘ऑल इज़ वेल’ नजर आता है।

मोबाइल लैब तो आ गई, पर साहबों की ‘नींद’ कब खुलेगी?

कमिश्नर साहब खुद मोबाइल टेस्टिंग लैब लेकर सड़कों की मजबूती नाप रहे हैं। जनता पूछ रही है कि जिन साहबों की जिम्मेदारी इस भ्रष्टाचार को रोकने की थी। क्या उन्हें मोतियाबिंद हो गया है या फिर ‘ठेकेदारों के प्रेम’ में उन्होंने अपनी आंखें मूंद ली हैं? करोड़ों की लागत से बनने वाली सड़कों पर उद्घाटन से पहले ही दरारें आ जाना यह बताने के लिए काफी है कि नीचे का अमला सिर्फ ‘ कमीशन और कमीशन के खेल में व्यस्त है?

जनकार्य विभाग का सफेद हाथी का क्या काम!

अगर हर सड़क की गुणवत्ता जांचने, ठेकेदारों को फटकार लगाने और पेनाल्टी ठोकने का काम खुद कमिश्नर क्षितिज सिंघल को ही करना है। तो जनकार्य विभाग के इस सफेद हाथी रूपी भारी-भरकम अमले को पालने की क्या जरूरत है? जनता के टैक्स के पैसे से इन्हें वेतन क्यों दिया जा रहा है? अब देखना यह है कि कमिश्नर सिंघल की इस ज़मीनी दौड़-भाग से निगम की इस ‘कुंभकर्णी फौज’ की नींद टूटती है या ये ‘साहब लोग’ इसी तरह अपनी जेबें गर्म कर चैन की बंशी बजाते रहेंगे!