Court Ruling on Police Security: अंतर-धार्मिक विवाह और सुरक्षा का मुद्दा; मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने याचिका खारिज की
इंदौर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए अंतर-धार्मिक विवाह करने वाले एक जोड़े को 24 घंटे की निजी पुलिस सुरक्षा देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि केवल आम आशंकाओं या संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर लगातार निजी सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश नहीं दिया जा सकता। यह मामला रतलाम के एक दंपत्ति से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई थी।
🛡️ ‘सबूतों के बिना असाधारण सुरक्षा नहीं’
जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसी असाधारण सुरक्षा मांगने वाली हर रिट याचिका खतरे के ठोस और स्पष्ट सबूतों से पुष्ट होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि संदिग्ध गाड़ियों के दिखने जैसी इक्का-दुक्का घटनाओं के लिए नियमित पुलिस गश्त और जांच पर्याप्त है, न कि इसके लिए निजी हथियारबंद गार्ड तैनात करने की जरूरत।
📜 शादी और धमकियों का सिलसिला
याचिकाकर्ता जोड़े ने 2019 में दिल्ली के आर्य समाज मंदिर में विवाह किया था। महिला ने स्वेच्छा से इस्लाम छोड़कर हिंदू धर्म अपनाया था। उन्होंने दावा किया कि शादी के बाद से ही उन्हें परिजनों और अन्य लोगों से जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। इससे पहले 2022 में हाई कोर्ट के निर्देश पर पुलिस ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की थी, लेकिन इस बार सुरक्षा के लिए तैनात हथियारबंद गार्ड को हटाकर होमगार्ड की तैनाती करने पर उन्होंने फिर से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
🚫 कोर्ट ने कहा- सुरक्षा तंत्र का ‘माइक्रोमैनेजमेंट’ संभव नहीं
हाई कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अदालतें सुरक्षा के नाम पर सुरक्षा तंत्र की भूमिका नहीं निभा सकतीं और न ही तैनात किए जाने वाले गार्डों के सूक्ष्म प्रबंधन (micromanagement) का काम कर सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का संवैधानिक कर्तव्य है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर हर अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह के मामले में याचिका दायर करना उचित नहीं है, जब तक कि आसन्न खतरे का कोई ठोस सबूत न हो।
👮 पुलिस का दायित्व है सक्रिय रहना
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब भी कोई शिकायत मिले, तो स्थानीय पुलिस अधिकारियों का यह संवैधानिक और वैधानिक दायित्व है कि वे मामले की गंभीरता को समझें और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करते हुए त्वरित कार्रवाई करें। कोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि भले ही अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार सर्वोपरि है, लेकिन सुरक्षा के तरीके तय करने का काम पुलिस प्रशासन का है, न कि अदालतों का।