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Mahendra Karma Death Anniversary: ‘बस्तर टाइगर’ महेंद्र कर्मा की 13वीं बरसी; गृह ग्राम फरसपाल में उमड़ा जनसैलाब

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दंतेवाड़ा: छत्तीसगढ़ के इतिहास को झकझोर देने वाले झीरम कांड और बस्तर के कद्दावर नेता स्वर्गीय महेंद्र कर्मा की शहादत को आज पूरे 13 वर्ष पूरे हो गए हैं। ‘बस्तर टाइगर’ के नाम से अपनी धाकड़ पहचान बनाने वाले स्वर्गीय महेंद्र कर्मा को आज भी अंचल के लोग एक ऐसे अद्वितीय जननेता के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन बस्तर की माटी, शोषित आदिवासी समाज और इस पिछड़े क्षेत्र के चौतरफा विकास के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया। उनके शहादत दिवस के पावन अवसर पर उनके गृह ग्राम फरसपाल सहित दंतेवाड़ा जिले के कई प्रमुख स्थानों पर गरिमामयी श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए गए, जहां हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

फरसपाल में आयोजित मुख्य श्रद्धांजलि कार्यक्रम में कांग्रेस, भाजपा समेत विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक दलगत राजनीति से ऊपर उठकर बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान लोगों ने महेंद्र कर्मा की आदमकद प्रतिमा पर पुष्पचक्र और मालाएं अर्पित कर उन्हें सादर नमन किया तथा उनके ऐतिहासिक संघर्ष, अदम्य साहस और बस्तर के प्रति अटूट समर्पण को याद किया। इस भावुक श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित हर शख्स की आंखें नम दिखाई दीं। स्थानीय लोगों ने भावुक होकर कहा कि महेंद्र कर्मा केवल एक साधारण राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि वे बस्तर की बुलंद आवाज और संपूर्ण आदिवासी समाज की एक मजबूत व निर्भीक पहचान थे।

🐅 बस्तर के गांव-गांव और हर घर तक थी महेंद्र कर्मा की पहचान: कठिन परिस्थितियों में भी जनता के सुख-दुख में रहे साथ

श्रद्धांजलि कार्यक्रम में मौजूद विभिन्न वक्ताओं ने उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वर्गीय महेंद्र कर्मा ने बस्तर की शांति, बुनियादी विकास और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमेशा अंतिम सांस तक संघर्ष किया। उन्होंने घोर नक्सलवाद और कठिन परिस्थितियों के बीच भी बस्तर के स्थानीय लोगों के हितों और अधिकारों को हमेशा अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा।

बस्तर संभाग के गांव-गांव और सुदूर जंगलों तक उनकी पहचान एक ऐसे मसीहा नेता के रूप में थी जो आम जनता के छोटे से छोटे सुख-दुख में हमेशा उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते थे। यही मुख्य कारण है कि उनकी मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी लोग उन्हें उसी अगाध श्रद्धा और सम्मान के साथ “बस्तर टाइगर” कहकर याद करते हैं।

🙏 गृह ग्राम फरसपाल में जुटी भारी भीड़, आयोजित हुई सर्वधर्म प्रार्थना सभा: 2 मिनट का मौन रखकर दी गई आत्मा को शांति

शहीद के गृह ग्राम फरसपाल में आयोजित मुख्य श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान एक विशेष सर्वधर्म प्रार्थना सभा का भी आयोजन किया गया, जिसमें सभी धर्मों के गुरुओं ने सहभागिता की। इस दौरान उपस्थित जनसैलाब ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत पुण्यात्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।

बड़ी संख्या में कतारबद्ध होकर पहुंचे ग्रामीणों और ग्रामीणों ने रुआंसे मन से कहा कि महेंद्र कर्मा की शहादत बस्तर के सामाजिक और राजनैतिक इतिहास की सबसे बड़ी और अपूरणीय क्षतियों में से एक है, जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती। उनका यह अटूट सपना था कि हमारा बस्तर बंदूक की संस्कृति से मुक्त होकर चहुंमुखी विकास, आधुनिक शिक्षा, बेहतर रोजगार और चिरस्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़े और क्षेत्र के भटके हुए युवा मुख्यधारा से जुड़कर देश के विकास में हाथ बंटाएं।

🏛️ दंतेवाड़ा के गायत्री मंदिर चौक पर भी गूंजे महेंद्र कर्मा के नारे: कांग्रेस परिवार ने प्रतिमा पर सूत की माला पहनाकर लिया संकल्प

इसी गौरवमयी क्रम में जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा के व्यस्त गायत्री मंदिर चौक पर स्थापित महेंद्र कर्मा की भव्य प्रतिमा पर भी स्थानीय कांग्रेस परिवार और पदाधिकारियों द्वारा पारंपरिक पुष्पमाला व सूत की माला अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। इस दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और युवा कार्यकर्ताओं ने कर्मा जी की प्रतिमा के समक्ष उनके अधूरे सपनों को पूरा करने और बस्तर की खुशहाली के लिए काम करने का सामूहिक संकल्प लिया। उपस्थित नेताओं ने कहा कि महेंद्र कर्मा का पूरा जीवन संघर्ष, अद्वितीय साहस और पीड़ित जनता के प्रति अटूट समर्पण की एक जीवंत मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

श्रद्धांजलि कार्यक्रम के समापन सत्र में शामिल नेताओं ने सर्वसम्मति से कहा कि महेंद्र कर्मा ने बस्तर के जल, जंगल और जमीन के लिए जो ऐतिहासिक योगदान दिया है, उसे इतिहास में कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने क्षेत्र के अंतिम व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई दिल्ली तक मजबूती से लड़ी। आज उनकी शहादत के 13 वर्ष गुजर जाने के बाद भी नई पीढ़ी के दिलों में उनके प्रति वही पुराना सम्मान, आदर और अपनापन साफ दिखाई देता है। कार्यक्रम के दौरान भारी तपिश के बावजूद उमड़ी महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की इस ऐतिहासिक उपस्थिति ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि शारीरिक रूप से भले ही कर्मा जी हमारे बीच न हों, लेकिन ‘बस्तर टाइगर’ आज भी बस्तर की जनता के दिलों में पूरी तरह जीवित हैं।

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