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IDA,राजनीतिक सिफारिशों के दम पर वर्षों से दिखा रहे दो अधिकारी नियमों को ठेंगा,इतने खुलासों के बावजूद सीईओ हैं चुप,जबकि योजना-संपदा में मलाई खा रहे श्रीवास्तव और बोचरे

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सिफारिशों के दम पर अधिकारियों का अंगदी करण,वर्षों से इंदौर में टीके,राजनीतिक घुसपैठ की वजह से इंदौर विकास प्राधिकरण का हो रहा सत्यानाश, सीईओ सहित पूरी सरकार है चुप,योजनाएं जनता से ज्यादा खुद के आ रही काम,फिर शहर जाए भाड़ में अपना होना चाहिए काम।

✍️अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर

इंदौर विकास प्राधिकरण में राजनीतिक रसूबो के दम पर नौकरी बजाने वालों की कमी नहीं हैं। यही सिफारिशें और राजनीतिक हस्तक्षेप ने इंदौर विकास प्राधिकरण को मात्र कठपुतली बना दिया हैं। जो आता है अपने मुताबिक कठपुतलियों को नचाकर चला जाता हैं। दरअसल सिफारिशों के दम पर ही इंदौर विकास प्राधिकरण की योजना शाखा प्रभारी रचना बौचरे पिछले पच्चीस सालों से इंदौर टिकी हुई है तो साथ ही इंदौर विकास प्राधिकरण संपदा अधिकारी मनीष श्रीवास्तव भी इसी सिफारिशों के चलते ही इंदौर में सरकारी नियमों को ठेंगा बता रहे हैं।

मनीष श्रीवास्तव 10 सालों से इंदौर में ही।

इंदौर विकास प्राधिकरण की संपदा शाखा प्रभारी मनीष श्रीवास्तव पिछले दस से ज्यादा सालों से इंदौर में जमे हुए हैं। वह भी प्रतिनियुक्ति पर क्योंकि मनीष श्रीवास्तव नायब तहसीलदार पद पर हैं। और राजस्व विभाग उनका मूल विभाग। लेकिन श्रीवास्तव को अपने मूल विभाग से ज्यादा IDA की मलाई भायि सो वह तमाम नियमों कायदों को ताक पर रखते हुए इंदौर में ही जम गए हैं। हालांकि कुछ वर्षों पूर्व मनीष श्रीवास्तव का तबादला सागर जरूर हुआ था। लेकिन रहस्यमय तरीके से वह तबादला ही निरस्त हो गया। मानो सिर्फ इंदौर को ही ऐसे अधिकारियों की दरकार है। या फिर यू कहे कि मनीष श्रीवास्तव को इंदौर नहीं छोड़ना हैं।

योजना शाखा प्रभारी के 25 साल

इधर ऐसे ही इंदौर विकास प्राधिकरण की योजना शाखा प्रभारी रचना बोचरे भी पिछले 25 सालों से इंदौर में जमी हुई हैं। उनका मूल विभाग नगर ग्राम निवेश हैं। लेकिन उन्हें भी IDA ऐसा रास आया कि वो अपने विभाग और अन्य किसी जिले में प्रति तीन साल में कहीं जाने को तैयार ही नहीं हैं।

सीईओ केवल चुप।

न्यूज विथ तड़का डॉट कॉम पिछले कई दिनों से इंदौर विकास प्राधिकरण के झोल,पोल और संपदा शाखा की कारस्तानियों को उजागर कर रहा है। लेकिन इस पूरे मामले में इंदौर विकास प्राधिकरण सीईओ डॉक्टर परीक्षित झाड़े की चुप्पी। कई सवाल खड़े कर रही हैं। दरअसल वह इसलिए क्योंकि कही न कही यह लगता है कि खुद सीईओ भी इन अधिकारियों के राजनीतिक रसूबो के चलते असहाय हैं। या फिर सबकुछ जानते हुए भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं।

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