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Pahalgam Tragedy: पहलगाम में जान गंवाने वाले IB अधिकारी के परिवार का छलका दर्द, बोले- “बोझ बन गई है जिंदगी, जख्म भरते नहीं”

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कश्मीर के पहलगाम में पिछले साल हुए आतंकी हमले को 22 अप्रैल को एक साल पूरे हो जाएंगे. तब इस हमले में आतंकियों ने सरेआम 26 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. इस हमले में बिहार के रोहतास जिले के रहने वाले मनीष रंजन की भी मौत हो गई थी. मनीष रंजन इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी थे. उनकी मौत के बाद उनकी और उनकी पत्नी की तस्वीर पूरे देश में वायरल हुई थी. बताया जा रहा है कि हमले के एक साल बाद भी परिवार के लोग इस सदमे से उबर नहीं पाए हैं. उनका हर एक दिन, हर एक लम्हा जीवन में बोझ की तरह गुजरा है.

मूल रूप से बिहार के रोहतास जिले के अरुही गांव में रहने वाले मनीष रंजन के पैतृक आवास पर आज की तारीख में उनके चाची और चाचा रहते हैं. मनीष के चाचा आलोक कुमार से जब उनसे हाल-चाल पूछा गया तो उनका गला रूंध गया. आवाज नहीं निकल पा रही थी. मनीष की चाची बताती हैं, पिछले एक साल में कोई भी ऐसा लम्हा नहीं गुजरा है, जब मनीष की याद न आई हो. जब-जब भी मनीष की याद आई, पूरा परिवार गमगीन हो गया है. आंखों से आंसू रुकते नहीं है. ऐसा लगता है कि मनीष उनके आसपास ही है. दरअसल अरुही गांव में मनीष रंजन के चाचा और चाची रहते हैं. वह कहती हैं, गांव में तो केवल हम ही लोग रहते हैं. लेकिन मनीष के परिजन पश्चिम बंगाल के झालदा में रहते हैं. मनीष भी भले ही झालदा में रहते थे, लेकिन वह हम लोगों से हमेशा संपर्क में रहते थे.

जाने किसकी नजर लग गई

मनीष की चाची बताती हैं कि मनीष एक लायक बेटा था. उसकी याद को कोई भी नहीं भुला पा रहा है. हम सभी को कितना दर्द है, वह हम ही समझ सकते हैं. रिश्तेदार नातेदार सब बातें तो करते हैं लेकिन उन बातों में मनीष का हीं जिक्र होते रहता है. बिना कुसूर के आतंकियों ने उसकी जान ले ली. अब केवल उसकी यादें रह गई है. ऐसी याद, जो जब भी आती है, पुराने जख्मों को उभार देती है.

वह कहती हैं, मनीष तीन भाई थे. हमारी कोई संतान नहीं है. हमारे लिए मनीष और उसके भाई ही सब कुछ थे. संसार में सब अपने होते हैं लेकिन अपनों के जाने का दर्द वही समझ सकता है जिसने बच्चों को बड़ा होते हुए देखा. मनीष सबसे बड़ा लड़का था. हमेशा फोन करता था. पूछता रहता था, आप लोग कैसे हैं? लोग नौकरी की तैयारी करते थे लेकिन मनीष इतना तेज था कि नौकरी उसके पीछे भागती थी. मनीष ने छह सरकारी नौकरी छोड़ी थी. आईबी में उसकी सातवीं नौकरी थी. इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि वह कितना तेज दिमाग का था.

माता पिता रोते रहते हैं

मनीष की चाची कहती हैं, मनीष अपने परिवार के साथ घूमने गया था लेकिन आतंकवादियों ने उसके हंसते खेलते परिवार को उजाड़ कर रख दिया. अगर एक उम्र होती तो थोड़ा दिल को समझ करके सुकून कर लेते. लेकिन जिस उम्र में मनीष को अपने परिवार को साथ लेकर चलना था, उस उम्र में आतंकियों ने उसे हमलोगों से उसे छीन लिया. मनीष के पिताजी और चाचा दोनों को बाईपास सर्जरी हुई है. मनीष के पिता का पिछले एक साल में कोई ऐसा दिन नहीं गुजरा है, जब उनकी आंखें नम नहीं हुई हो. हमेशा आंख से आंसू गिरते रहते हैं. पता नहीं हम सभी घर वाले किस जन्म का पाप झेल रहे हैं? हम लोगों की तो बस अब उम्र ही कट रही है.

प्रयागराज में हुई थी शादी

मनीष की चाची कहती हैं, उसकी शादी प्रयागराज में हुई थी. बहू भी पढ़ी लिखी है. उनके ससुराल वालों से भी हमारी बातचीत होती है. बहू से भी बातचीत होती है. बहू आती भी रहती है, लेकिन उस घटना के सदमे से अब तक वह बाहर नहीं निकल पाई है. बात करते-करते बेहोश हो जाती है. पिछले एक साल में उसने केवल उतना ही अन्न ग्रहण किया है, जितने से वह जिंदा रह सके. सरकार की तरफ से तब बहुत वादे किए गए थे लेकिन अब तक कुछ ठोस कदम नहीं उठे हैं.

एक साल होने को है, बहू को नौकरी नहीं मिली

मनीष की चाची कहती हैं कि कहा गया था कि बहू को नौकरी मिलेगी लेकिन एक साल होने को है. अभी तक प्रक्रिया ही जारी है. बहू जया आती जाती रहती है. हम लोगों को इतना दर्द है तो अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि हमारी बहू किस दर्द में होगी. वह यह भी बताती हैं कि पिछले एक साल में राज्य सरकार की तरफ से या किसी भी नेता, अधिकारी की तरफ से हमारी किसी ने सुध नहीं ली है. किसी ने हमारे दरवाजे तक आकर के हमारे हाल-चाल को नहीं जाना है.

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