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मेडिकेप्स यूनिवर्सिटी एडमिशन के वक्त छात्रों को दिखाते है बड़े बड़े सपने,डिग्री पूरी होते ही आड़े आते मेडिकेप्स के नियम कायदे,एमसीए,एमबीए,बीटेक के छात्र डिग्री होते हुए बेरोजगार

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मामला मेडिकेप्स यूनिवर्सिटी का,एडमिशन के वक्त छात्रों को दिखाते है बड़े बड़े प्लेसमेंट के सपने,लेकिन आखिरी साल बाद, छात्र हो जाते है निराश,नहीं मिलती नौकरी डिग्री लेकर छात्र परेशान।

✍️अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर

इंदौर शहर देशभर में एजुकेशन हब के तौर पर जाना जाता हैं। लिहाजा सैकड़ों नहीं बल्कि लाखों छात्र प्रदेशभर से तो देशभर से इंदौर आते है ताकि उनका भविष्य कैरियर संवर जाए। छात्र इंदौर आते है उन्हें अलग अलग कोचिंग इंस्टीट्यूट और यूनिवर्सिटी बड़े बड़े प्लेसमेंट के सपने दिखाती हैं। छात्र भी अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए एजुकेशन लोन तक ले लेते हैं। ताकि वह उन यूनिवर्सिटी में प्रवेश हासिल कर सके। और उन्हें जो पहले साल में बड़े बड़े प्लेसमेंट यानी नौकरियों के दावे किए जाते हैं। वो वह हासिल कर ले। लेकिन छात्रों को अपने आखिरी साल में जो झटका लगता है। वह उससे उभर नहीं पाते हैं।

दरअसल हम बात कर रहे है शहर की मेडिकेप्स यूनिवर्सिटी की। जहां छात्रों को ऊंचे ऊंचे पैकेज और प्लेसमेंट के सपने दिखाए जाते हैं। लेकिन अंतिम साल और डिग्री पूरी हो जाने के बाद वह खोखले साबित होते हैं। ऐसे ही कई मामले है जिसमें छात्र प्लेसमेंट के लिए परेशान हैं। और उनसे जो दावे किए गए थे। वो खोखे साबित होते हैं। क्योंकि मेडिकैप्स यूनिवर्सिटी में छात्रों को रोजगार देने से ज्यादा खुद उसके नियम कायदे आड़े आते हैं।

एमसीए,एमबीए,और बीटेक के छात्रों को है रोजगार का संकट।

दरअसल मेडिकेप्स यूनिवर्सिटी के एमसीए,एमबीए और बीटेक के छात्र सबसे ज्यादा परेशान हैं। क्योंकि इनमें से कई छात्र ऐसे है जो अपनी डिग्री पूरी कर चुके हैं। लेकिन मेडिकेप्स यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए वायदे मुताबिक उन्हें प्लेसमेंट नहीं मिल पाया हैं। और न ही ऐसे छात्रों को इंटर्नशिप मिल पा रही हैं। क्योंकि मेडिकैप्स यूनिवर्सिटी के जो नियम कायदे है वह इसमें रोड़ा डाल रहा हैं। वह इसलिए कि मेडिकेप्स यूनिवर्सिटी ने एमबीए छात्रों के लिए जो दिशानिर्देश तय किए हैं। उसके मुताबिक पांच करोड़ और दस करोड़ सालाना वाली कंपनियों में ही वह इंटर्नशिप या प्लेसमेंट हासिल कर सकते है। लिहाजा ऐसी स्थिति में छात्र बेरोजगारी का जीवन जीने पर मजबूर हैं।

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