INDORE, आईडीए सीईओ का मास्टरस्ट्रोक,सौदेबाज घनचक्कर, फ्री होल्ड में फंसा पेंच, खरीद फ़रोख़्त की दुकान मंगल,आमजनता में खुशी, प्रक्रियाएं हुई सरल।
IDA सीईओ के आगे सौदेबाज हुए घनचक्कर; फ्री-होल्ड में फंसा पेंच, खरीद-फ़रोख़्त की दुकान हुई मंगल!

✍️अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर।
इंदौर विकास प्राधिकरण में बरसों से चल रहे कर्मचारी कोटे और कर्मचारियों के मलाईदार खेल पर अब पूरी तरह ग्रहण लग गया है। आईडीए के मुखिया, सीईओ डॉ. परीक्षित झाड़े ने ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि आईडीए के भूखंडों को कौड़ियों के दाम पर खरीदने बेचने वाले कर्मचारी और बिल्डरों की मिलीभगत पूरी तरह धूल में मिल गई है। IDA के गलियारों में लंबे समय से चल रहे खेल पर अब पूरी तरह से ब्रेक लग गया है। आईडीए मुख्य कार्यपालिक अधिकारी डॉ. परीक्षित झाड़े के एक कड़े और नीतिगत फैसले ने उन भ्रष्ट अधिकारियों और बिल्डरों की नींद उड़ा दी है, जो IDA के भूखंडों की खरीद फ़रोख़्त की बंदरबांट में लगे हुए थे।

ये है आदेश।

इंदौर विकास प्राधिकरण सीईओ डॉक्टर परीक्षित झाड़े ने भूखंडों के फ्री होल्ड प्रक्रिया में निर्माण आवंटित भूखंडों पर निर्माण होना आवश्यक कर दिया हैं। लिहाजा अब उन ऐसे भूखंडों को लेकर ऐसे लोग घनचक्कर है, जिन्होंने मुनाफा कमाने के लिए IDA के ऐसे भूखंड हथिया लिए थे। लेकिन अब सीईओ के नए आदेश के चलते उनके तमाम मंसूबे पर पानी फिर गया हैं।

कौड़ियों के दाम पर महंगे प्लॉट हथियाने का खेल

सूत्रों के मुताबिक इंदौर विकास प्राधिकरण की विभिन्न महत्वपूर्ण शाखाओं जिसमें संपदा, भू-अर्जन, योजना, स्थापना और इंजीनियर शाखा शामिल हैं,इनके कई कर्मचारी और अधिकारी मिलकर बड़ा खेल, खेल रहे थे। ये लोग कर्मचारी कोटे का गलत इस्तेमाल करके प्राधिकरण के सबसे महंगे और प्राइम लोकेशन वाले भूखंडों को कौड़ियों के दाम दामों पर अपने नाम करवा लेते थे। इन भूखंडों को अपने नाम कराने के बाद असली खेल शुरू होता था। कर्मचारियों ने शहर के बड़े-बड़े बिल्डरों से गुप्त सांठगांठ,सेटिंग कर रखी हैं। जिन्हें अच्छी लोकेशन और साइज वाले इन कीमती प्लॉट्स को आम जनता के सामने आने से पहले ही बैकडोर से बिल्डरों को ऊंचे दामों पर देने का तय हो जाता था। इसके बाद होने वाले करोड़ों रुपये के मुनाफे की आपस में बंदरबांट की जाती थी।

सीईओ डॉ. परीक्षित झाड़े का ‘मास्टरस्ट्रोक’

लगातार मिल रही शिकायतों और गड़बड़ी की आशंका को देखते हुए सीईओ डॉ. परीक्षित झाड़े ने बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने प्राधिकरण के भूखंडों को फ्री-होल्ड करने की प्रक्रिया को पूरी तरह से सशर्त (Conditional) बना दिया है। नए कड़े नियमों के तहत खाली पड़े या बिना निर्माण भूखंडों के नियमों को दरकिनार कर किसी भी प्लॉट को फ्री-होल्ड नहीं किया जा सकेगा। इस आदेश के बाद से बिना पुख्ता कागजातों और वैध प्रक्रिया के भूखंडों की खरीद-फरोख्त करने वाले माफियाओं में हड़कंप मच गया है। बिल्डरों और कर्मचारियों की बरसों पुरानी मिलीभगत पूरी तरह धूल में मिल गई है और अवैध सौदेबाजों की ‘दुकानें’ पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं।
आम जनता और वैध भूखंडधारकों को मिली बड़ी राहत

एक तरफ जहां भ्रष्ट तत्वों पर नकेल कसी गई है। वहीं दूसरी तरफ आम जनता और वैध भूखंडधारकों के लिए राहत के दरवाजे खोल दिए गए हैं। सीईओ झाड़े के निर्देश पर विभिन्न योजनाओं के तहत विशेष शिविरों का आयोजन किया जा रहा है। ऐसे वैध भूखंडधारक जिन्होंने अपने प्लॉट पर मकान बना लिए हैं, उन्हें अब दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे हैं। इन शिविरों के माध्यम से फ्री-होल्ड, नामांतरण , लीज नवीनीकरण और लीज रेंट से जुड़े तमाम काम बेहद सुलभ और पारदर्शी तरीके से सीधे पूरे किए जा रहे हैं। प्राधिकरण के इस रुख से आम जनता बहुत खुश हैं। एक तरफ जहां भ्रष्ट तंत्र पर ताला लगा है।

वहीं दूसरी तरफ आम जनता की चांदी हो गई है। सीईओ के निर्देश पर शहर के अलग-अलग हिस्सों में विशेष कैंप लगाए जा रहे हैं। जिन आम लोगों ने अपने प्लॉट्स पर घर बना लिए हैं, उन्हें अब दलालों के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे हैं। इन कैंपों के जरिए फ्री-होल्ड, नामांतरण, लीज नवीनीकरण और लीज रेट जैसे पेचीदा काम बिना किसी रिश्वत या परेशानी के सीधे मौके पर ही निपटाए जा रहे हैं।

झाड़े का ‘चाबुक’: फ्री-होल्ड पर लगी सशर्त लगाम

इस पूरे खेल की भनक लगते ही सीईओ डॉ. परीक्षित झाड़े ने कड़ा प्रशासनिक हंटर चलाया है। उन्होंने भूखंडों को फ्री-होल्ड करने की पूरी प्रक्रिया को बेहद सशर्त और पारदर्शी बना दिया है। नए नियमों का ऐसा पेंच फंसा है कि अब बिना कड़ी जांच और वैध प्रक्रिया के किसी भी प्लॉट का ट्रांसफर या फ्री-होल्ड होना नामुमकिन हो गया है। इस एक आदेश ने अवैध खरीद-फरोख्त की दुकान को पूरी तरह ‘मंगल’ कर दिया है। ‘न्यूज with तड़का’ डॉट कॉम के खोजी सूत्रों के मुताबिक, आईडीए के संपदा, भू-अर्जन, योजना, स्थापना और इंजीनियर शाखा के कुछ ‘शातिर’ कर्मचारियों ने अपना एक अलग ही सिंडिकेट बना रखा हैं। ये लोग कर्मचारी कोटे का नाजायज फायदा उठाकर सबसे प्राइम लोकेशन और महंगे भूखंडों को अपने नाम करा लेते थे। इसके बाद, शहर के रसूखदार बिल्डरों से अंदरूनी ‘सेटिंग’ कर इन कीमती प्लॉट्स को जनता के सामने आने से पहले ही करोड़ों के मुनाफे में बेच दिया जाता था। इस काली कमाई की बंदरबांट नीचे से ऊपर तक होती थी।