INDORE रॉयल ग्रीन काउंटी में घोटालों की भरमार,नियमों को ताक पर रख मिला नगर निगम से पूर्णता प्रमाण पत्र,जांच में छुपाई असलियत,वरिष्ठ अधिकारी हो गए गुमराह,खनिज विभाग की भारीभरकम पैनल्टी भी भूले जिम्मेदार।
निहालपुर मुंडी,रॉयल ग्रीन काउंटी टाउनशिप, बड़े घोटाले,,नियमों को ताक पर रख मिला नगर निगम से पूर्णता प्रमाण पत्र,जांच में छुपाई असल जानकारी,वरिष्ठ अफसर भी गुमराह,खनिज विभाग खुद भुला अपनी शिकायत, भारी भरकम पेनल्टी अभी भी बाकी।

✍️अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर
निहालपुर मुंडी स्थित ‘रॉयल ग्रीन काउंटी टाउनशिप’ के कर्ताधर्ताओं द्वारा किए जा रहे कथित अवैध निर्माण, पर्यावरणीय नुकसान और प्रशासनिक सांठगांठ का एक बड़ा मामला सामने है। ‘न्यूज विद तड़का डॉट कॉम’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरी टाउनशिप में नियमों और पर्यावरण कायदों की जमकर धज्जियां उड़ाई गई हैं। इस पूरे मामले में शामिल अवैध गतिविधियों और उनके उल्लंघन के दायरे में आने वाले नियम है, जिनका रॉयल ग्रीन काउंटी टाउनशिप कर्ताधर्ताओं द्वारा उल्लंघन तो किया गया हैं लेकिन जिम्मेदार विभाग जिला प्रशासन, इंदौर नगर निगम,और खनिज विभाग अभी भी सो रहे है। बाद में इन जिम्मेदारों की नींद का खामियाजा आम व्यक्ति को उठाना पड़ सकता हैं। क्योंकि बिल्डर तो भूखंड बेचकर निकल लेंगे लेकिन कानूनी पेंच झेलेंगी आमजनता।

वृक्ष संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन और दिखावे की कार्रवाई
टाउनशिप प्रबंधन ने निर्माण क्षेत्र से बड़ी संख्या में हरे-भरे पेड़ों को अवैध रूप से काट दिया। इंदौर नगर निगम के उद्यान विभागीय अमले से मिलीभगत के चलते, सिर्फ 5 पेड़ों का नाममात्र चालान बनाकर पूरे मामले पर पर्दा डाल दिया गया।
संबद्ध नियम व कायदा।

मध्य प्रदेश वृक्षों का संरक्षण (नगरीय क्षेत्र) अधिनियम, 2001 के तहत शहरी क्षेत्रों में बिना सक्षम अधिकारी (वृक्ष अधिकारी/कमिश्नर) की लिखित अनुमति के पेड़ काटना गंभीर अपराध है। अवैध रूप से पेड़ काटने पर प्रति पेड़ भारी जुर्माना और कारावास का प्रावधान है। यहाँ वास्तविक पेड़ों की संख्या छुपाकर चालान बनाना वित्तीय और पर्यावरणीय धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।

सरकारी भूमि पर अतिक्रमण (निजी सड़क के लिए तालाब बर्बाद।
बिल्डर ने सरकारी जमीन पर कब्जा करके अपनी निजी सड़क का निर्माण कर लिया। इसके अलावा, सार्वजनिक और सरकारी तालाब की भूमि पर भी अवैध निर्माण (अतिक्रमण) कर लिया गया हैं। मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता (MPLRC), 1959 की धारा 248: इसके तहत सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण पूरी तरह अवैध है। प्रशासन को इसे तत्काल ढहाने और अतिक्रमणकारी पर बेदखली व जुर्माने की कार्रवाई करने का अधिकार है।

माननीय सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश (हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी) कोर्ट के कड़े निर्देश हैं कि तालाबों, पोखरों और जल निकायों की भूमि का स्वरूप नहीं बदला जा सकता और न ही उन पर कोई निर्माण किया जा सकता है।
नियमों के खिलाफ ‘पूर्णता प्रमाण पत्र’ जारी होना
सरकारी जमीन पर कब्जे और अवैध पेड़ कटाई के बावजूद, इंदौर नगर निगम के ‘कॉलोनी सेल’ ने इस टाउनशिप को पूर्णता प्रमाण पत्र (Completion Certificate) जारी कर दिया। संबद्ध नियम व कायदा: मध्य प्रदेश भूमि विकास नियम, 1984 और म.प्र. नगर पालिका (कॉलोनाइजर का रजिस्ट्रीकरण, निर्बंधन तथा शर्तें) नियम के अनुसार, जब तक कोई प्रोजेक्ट स्वीकृत ले-आउट के अनुसार शत-प्रतिशत वैध न हो, तब तक कॉलोनी सेल पूर्णता प्रमाण पत्र जारी नहीं कर सकता। अवैध निर्माण वाली साइट को सर्टिफिकेट देना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और विभागीय अधिकारियों की संलिप्तता को दर्शाता है।

प्रशासनिक जांच में लीपापोती और अफसरों को गुमराह करने का खेल!
जांच अधिकारी टीना सिसोदिया ने शुरुआत में कड़े तेवर दिखाए, लेकिन बाद में उन्होंने कथित तौर पर पाला बदल लिया। वे खुद रॉयल ग्रीन काउंटी टाउनशिप के कर्ताधर्ताओं की पैरवी करने लगीं और वरिष्ठ अधिकारियों को गुमराह करने वाली रिपोर्ट पेश की। उक्त संबद्ध नियम व कायदा कहता है कि मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के तहत किसी भी लोक सेवक द्वारा निजी हितों या बिल्डरों को लाभ पहुंचाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करना, तथ्यों को छुपाना और वरिष्ठों को गुमराह करना कदाचार की श्रेणी में आता है। इसके लिए अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच (DE) और निलंबन की कार्रवाई हो सकती है।

खनिज विभाग की पेनाल्टी की अनदेखी

आरोप टाउनशिप निर्माण के दौरान अवैध उत्खनन और नियमों के उल्लंघन को लेकर खनिज विभाग ने भारी-भरकम 8 करोड़ से ज्यादा की पेनाल्टी (जुर्माना) लगाई थी। लेकिन जिला प्रशासन और खनिज विभाग खुद अपनी ही शिकायत और इस जुर्माने की वसूली को दबाकर बैठ गए हैं। जबकि मध्य प्रदेश गौण खनिज नियम के तहत अवैध उत्खनन या बिना रॉयल्टी चुकाए खनिज (मिट्टी, मुरम, गिट्टी) का उपयोग करने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है। वसूली न होने पर भू-राजस्व की बकाया (Arrears of Land Revenue) की तरह कुर्की की कार्रवाई की जानी चाहिए, जो कि इस मामले में ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।