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Ganga Dussehra Haridwar: हरिद्वार में गंगा दशहरा पर उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब; हर की पैड़ी पर लगी आस्था की डुबकी

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हरिद्वार: सनातन धर्म के सबसे पवित्र त्योहारों में से एक ‘गंगा दशहरा’ के पावन अवसर पर आज धर्मनगरी हरिद्वार में श्रद्धालुओं का अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ पड़ा है। सुबह तड़के (ब्रह्ममुहूर्त) से ही देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं का हर की पैड़ी घाट पर आगमन शुरू हो गया था। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आज गंगा दशहरा के पवित्र दिन मां गंगा में आस्था की डुबकी लगाने से मनुष्य के ज्ञात-अज्ञात 10 बड़े पाप पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। इस वर्ष पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) का दुर्लभ संयोग होने के कारण गंगा दशहरे की महत्ता और आध्यात्मिक फल कई गुना अधिक बढ़ गया है।

हरिद्वार के मुख्य हर की पैड़ी घाट के अलावा सुभाष घाट, कुशा घाट, चंडी घाट, कनखल के ऐतिहासिक राजघाट, दक्षेश्वर महादेव मंदिर घाट और शीतला माता मंदिर घाट पर भी सुबह से ही पैर रखने की जगह नहीं है और चारों तरफ मां गंगे के जयकारे गूंज रहे हैं।

🔱 क्यों खास और मोक्षदायी माना जाता है यह पवित्र दिन? भगवान शिव की जटाओं से धरती पर अवतरित हुई थीं मां पतित पाविनी

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, गंगा दशहरा का यह महापर्व मां गंगा के स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक पर अवतरण के उपलक्ष्य में पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, मां गंगा ब्रह्मा जी के कमंडल से निकलकर और भगवान विष्णु के चरणों को स्पर्श करते हुए भगवान शिव की जटाओं में समाई थीं। इसके बाद ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन वे शिव की जटाओं से मुक्त होकर पृथ्वी लोक पर अवतरित हुई थीं, इसीलिए इस पवित्र तिथि को संसार में ‘गंगा दशहरा’ के रूप में पूजा जाता है।

निर्वाण पीठाधीश्वर और श्री महानिर्वाणी पंचायती अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर विशोकानंद भारती महाराज ने इस दिन की महिमा बताते हुए कहा कि हमारी दस इंद्रियों (पांच कर्मेंद्रियां और पांच ज्ञानेन्द्रियां) द्वारा किए गए भूलवश पापों का शमन आज के दिन गंगा मैया की गोद में जाने से हो जाता है। उन्होंने बताया कि इस विशेष स्नान से जीवात्मा को 28 प्रकार की नरक यातनाओं से मुक्ति मिलती है। यह स्नान मनुष्य के शरीर द्वारा किए गए 3, वाणी द्वारा किए गए 4 और मन के स्तर पर किए गए 3 तरह के मानसिक पापों को हमेशा के लिए नष्ट कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

🔢 गंगा दशहरा में ‘संख्या 10’ का है अद्भुत और विशेष महत्व: राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से सफल हुआ था पूर्वजों का उद्धार

गंगा दशहरा के पर्व में गणितीय और आध्यात्मिक दृष्टि से संख्या 10 का एक बेहद अनूठा और विशिष्ट महत्व है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी की इस पावन तिथि पर अंतरिक्ष में 10 विशिष्ट शुभ योगों का एक दुर्लभ संयोग बनता है। यही मुख्य कारण है कि आज के दिन किया गया गंगा स्नान, ध्यान, उपवास और दान-पुण्य सामान्य दिनों की तुलना में सीधे 10 गुना अधिक फल प्रदान करता है।

इतिहास गवाह है कि इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा भगीरथ की घोर और निस्वार्थ तपस्या के कारण ही मां गंगा स्वर्ग की अमरता छोड़कर पृथ्वी लोक पर आईं और जनकल्याण के साथ-साथ भगीरथ के साठ हजार पूर्वजों के उद्धार और मोक्ष का एकमात्र कारण बनीं। जब गंगा दशहरा के दिन धरा पर मां गंगा का वेग शांत हुआ, तो समस्त चराचर सृष्टि का कल्याण संभव हो सका।

🍉 अक्षय पुण्य की प्राप्ति के लिए दान का महापर्व: घड़ा, सत्तू और मौसमी फलों के दान से प्रसन्न होंगे भगवान नारायण

शास्त्रों के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन किए गए दान-पुण्य का फल कभी समाप्त नहीं होता, जिसे ‘अक्षय पुण्य’ कहा जाता है। इस दिन गरीब जरूरतमंदों और विद्वान ब्राह्मणों को शीतल जल, मिट्टी का घड़ा (कुंभ), अन्न, नए वस्त्र, हाथ का पंखा और इस मौसम के विशेष फल जैसे खरबूजा, तरबूज, रसीले आम आदि का दान करना परम कल्याणकारी माना गया है।

आज के दिन हरिद्वार के अलावा ऋषिकेश, देवप्रयाग, प्रयागराज और वाराणसी (काशी) में भी लाखों श्रद्धालु मां गंगा की आरती में भाग ले रहे हैं। विद्वानों के अनुसार, आज के दिन जल में खड़े होकर “ॐ नमो गंगे विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमः” महामंत्र का मानसिक जाप करने से साधक को परम आध्यात्मिक शांति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

🕉️ पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) के संयोग से बढ़ा महत्व: भगवान श्री हरि के प्रिय महीने में हुआ अमृतमयी जल का अवतरण

इस वर्ष पुरुषोत्तम मास के भीतर गंगा दशहरा का आना एक अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी घटना है। चूंकि मां गंगा साक्षात भगवान विष्णु के चरणों से निकली हैं और पुरुषोत्तम मास पूरी तरह से भगवान श्री नारायण हरि को ही समर्पित माना जाता है, इसलिए विष्णुप्रिया गंगा का विष्णु के ही प्रिय महीने में पूजन करने से जातक को कोटि-कोटि पुण्यों का लाभ सहज ही मिल जाता है। विभिन्न प्रामाणिक धर्म ग्रंथों की मान्यताओं के अनुसार, यदि ज्येष्ठ मास के अंतर्गत पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) का संयोग बन रहा हो, तो ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन ही गंगा दशहरा का मुख्य पर्व मनाना पूर्णतः शास्त्र सम्मत, शुभ और अनंत फलदायी माना गया है।

☀️ वृषभ राशि में सूर्य का होना है आवश्यक: जानिए क्यों 25 मई को ही मनाना है पूरी तरह शास्त्र सम्मत

पंचांग और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, गंगा दशहरा के निर्धारण के लिए सूर्य देव का वृषभ राशि में गोचर करना अनिवार्य शर्त है। आगामी 15 जून को पुरुषोत्तम मास सुबह 8:24 पर पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, जबकि सूर्य देव दोपहर 12:53 पर मिथुन राशि में प्रवेश कर जाएंगे। शास्त्रज्ञों के अनुसार, मिथुन राशि के सूर्य में गंगा दशहरा मनाना किसी भी प्रकार से न्यायसंगत और शास्त्र सम्मत नहीं माना गया है।

यही कारण है कि सूर्य के वृषभ राशि में रहते हुए ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को यानी 25 मई के दिन ही गंगा दशहरा का महापर्व मनाना सर्वथा उचित और अकाट्य है। इसके विपरीत, निर्जला एकादशी का व्रत अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के पूर्ण रूप से समाप्त होने के बाद शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यानी आगामी 25 जून के दिन पूरी निष्ठा के साथ रखा जाएगा और उसी दिन उससे संबंधित दान-पुण्य के कार्य किए जाएंगे।

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