Indore WildLife News: इंदौर में मोरों को गर्मी से बचाने की मुहिम; वन विभाग ने 15 जगहों पर की दाना-पानी की व्यवस्था
इंदौर: मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर और उसके आसपास के वन क्षेत्रों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और चिलचिलाती धूप का असर अब मूक वन्यजीवों पर भी साफ दिखने लगा है। ऐसे में राष्ट्रीय पक्षी मोरों को भीषण गर्मी के कारण होने वाले जानलेवा डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) से सुरक्षित रखने के लिए इंदौर वन विभाग (Forest Department) पूरी मुस्तैदी से आगे आया है। विभाग द्वारा वन्यजीव बाहुल्य क्षेत्रों में जगह-जगह मोरों के लिए नियमित दाना-पानी की पुख्ता व्यवस्था की जा रही है। अकेले मुख्य इंदौर शहरी व उप-शहरी सीमा के भीतर ऐसे पंद्रह (15) अति-संवेदनशील स्थानों को चिन्हित किया गया है, जहां मोरों की संख्या और उनकी बसावट सबसे ज्यादा पाई जाती है। इन सभी चिन्हित स्थानों पर पेड़ों की छांव में मिट्टी के बड़े-बड़े सकोरों में हर सुबह साफ पानी भरा जा रहा है, ताकि पक्षी अपनी प्यास बुझा सकें। इसके साथ ही मोरों के पौष्टिक आहार के लिए ज्वार और मक्का के दानों की भी पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है।
📍 रालामंडल, रेसीडेंसी और पीटीएस समेत इन 15 क्षेत्रों पर विशेष फोकस: मानपुर में भी तैयारी, लेकिन महू और चोरल अब तक अछूते
वन विभाग के मैदानी अमले से मिली जानकारी के अनुसार, इंदौर के जिन प्रमुख 15 स्थानों पर मोरों के संरक्षण के लिए सकोरे और दाने डाले जा रहे हैं, उनमें मुख्य रूप से प्रसिद्ध रालामंडल अभयारण्य (Ralamandal Sanctuary), वीआईपी रेसीडेंसी एरिया, ऐतिहासिक हुकुमचंद मिल परिसर, बाणगंगा क्षेत्र और पीटीएस (PTS) ग्राउंड शामिल हैं। इन इलाकों में मोरों की घनी आबादी रोज सुबह-शाम भोजन-पानी की तलाश में भटकती है।
इसके साथ ही, इंदौर से सटे मानपुर वन परिक्षेत्र में भी कुछ ग्रामीण और पहाड़ी स्थानों पर मोरों को इस जानलेवा गर्मी से तत्काल राहत देने को लेकर स्थानीय स्तर पर मुस्तैदी से व्यवस्थाएं जुटाई जा रही हैं। मगर इसके विपरीत, वन विभाग के ही अधीन आने वाले महू (Mhow) और चोरल (Choral) जैसे बड़े और घने वन क्षेत्रों में अभी तक मोरों के लिए दाना-पानी की जमीनी स्तर पर कोई भी व्यवस्था शुरू नहीं की गई है, जिससे वहां के वन्यजीव प्रेमियों में गहरी चिंता है।
💰 महू और चोरल रेंजों में बजट के अभाव का अलापा जा रहा राग: जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता से खतरे में राष्ट्रीय पक्षी
महू और चोरल जैसे घने और प्राकृतिक तौर पर समृद्ध जंगलों में अब तक राष्ट्रीय पक्षी मोरों के लिए जल स्रोतों के रखरखाव और सकोरे रखने की व्यवस्था न होने पर जब ग्राउंड मीडिया ने जिम्मेदार विभागीय अधिकारियों से सवाल पूछे, तो वे हमेशा की तरह सरकारी फंड और बजट के अभाव का पुराना राग अलाप रहे हैं। अधिकारियों का तर्क है कि इस विशेष ग्रीष्मकालीन व्यवस्था के लिए ऊपर से अलग से बजट आवंटित नहीं हुआ है।
स्थानीय पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि महू और चोरल की पहाड़ियों में इस समय प्राकृतिक जल स्रोत (नदी-नाले और झिरिया) पूरी तरह से सूख चुके हैं। ऐसे में यदि वन विभाग ने बजट का रोना छोड़कर समय रहते कृत्रिम रूप से दाना-पानी की आपातकालीन व्यवस्था नहीं की, तो पानी की तलाश में मोरों के आबादी वाले क्षेत्रों की ओर पलायन करने और डिहाइड्रेशन व आवारा कुत्तों के हमलों के कारण असमय दम तोड़ने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।