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Amarkantak Naxal News: नक्सलियों के निशाने पर अमरकंटक! हेडक्वार्टर बनाने की थी तैयारी, सुरक्षा बलों की मुस्तैदी से मसूबा नाकाम

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मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले से नक्सल गतिविधियों को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया है. बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा ने नक्सलियों की उस खतरनाक विस्तार नीति का खुलासा किया है, जिसके तहत नक्सली अमरकंटक को अपना नया हेडक्वार्टर बनाने की साजिश रच रहे थे. सुरक्षा बलों की मुस्तैदी और लगातार कार्रवाई से नक्सलियों का यह मंसूबा को पूरी तरह विफल हो गया.

एसपी के अनुसार, नक्सलियों ने साल 2013 में अपनी सेंट्रल कमेटी के जरिए एक प्लान तैयार किया था. छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ क्षेत्र में बढ़ते दबाव के चलते वह नया सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे थे. इसी क्रम में उनकी नजर मध्य प्रदेश के अमरकंटक क्षेत्र पर गई, जो घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों से घिरा हुआ है और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.

2 साल तक किया सर्वे, बनाया MMC जोन

जानकारी के मुताबिक, नक्सलियों ने 2015 से 2017 के बीच इस पूरे इलाके का गुप्त सर्वे किया. इसके बाद एमएमसी जोन (मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़) का गठन किया गया. इस जोन के तहत केबी (कान्हा-भोरमदेव) और जीआरबी (गोंदिया-राजनांदगांव-बालाघाट) जैसे डिवीजन बनाए गए, जिनमें करीब 150 हथियारबंद नक्सली सक्रिय थे. उनका उद्देश्य इस इलाके को रेड कॉरिडोर के रूप में विकसित करना था.

क्यों अमरकंटक को बनाना चाहते थे हेडक्वार्टर?

अमरकंटक को चुनने के पीछे बड़ा कारण इसकी भौगोलिक स्थिति थी. यहां से महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के नक्सल प्रभावित इलाकों तक आसानी से संपर्क स्थापित किया जा सकता था. नक्सली इसे अपनी लाल राजधानी बनाकर कई राज्यों में गतिविधियों को नियंत्रित करना चाहते थे.

दस्तावेजों के अनुसार, अमरकंटक से महाराष्ट्र का गढ़चिरौली (454 किमी), बस्तर (584 किमी), झारखंड का पलामू (403 किमी) और बिहार का नवादा (610 किमी) एक रणनीतिक दूरी पर थे.

कैसे ढह गया नक्सलियों का यह किला?

नक्सलियों की इस विस्तार नीति के फेल होने की सबसे बड़ी वजह नेतृत्व का अंत रही. नवंबर 2021 में महाराष्ट्र की सी-60 फोर्स के साथ हुए एनकाउंटर में मास्टरमाइंड मिलिंद तेलतुमड़े मारा गया. मिलिंद की मौत ने संगठन की रीढ़ तोड़ दी .बाद एमएमसी जोन के नेतृत्व को लेकर संगठन के भीतर ही दरारें पैदा हो गईं. लगातार बढ़ते ‘एंटी-नक्सल ऑपरेशंस’ और पुलिस की चौकसी ने नक्सलियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया.

आज स्थिति यह है कि जो संगठन कभी हजारों की संख्या में होने का दावा करता था, उन्हें अब उंगलियों पर गिना जा सकता है. शांति की ओर बढ़ते कदम अमरकंटक, जो अपनी पवित्रता और नर्मदा के उद्गम के लिए जाना जाता है, उसे खूनी संघर्ष का केंद्र बनाने की नक्सलियों की कोशिश अब इतिहास के पन्नों में दफन होती नजर आ रही है. सुरक्षा बलों की मुस्तैदी ने न केवल ‘विस्तार नीति’ को विफल किया, बल्कि उन आदिवासियों और ग्रामीणों को भी राहत दी है जो लंबे समय से इस हिंसा की चपेट में थे.

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