INDORE,उपचुनाव 2026, कहीं जश्न, कहीं जंतरमंतर का फेर,भाजपा की लिए आत्ममंथन तो कांग्रेस की उधारी की बैसाखी पर उछलकूद।
कहीं जश्न, कहीं जंतर-मंतर का फेर; भाजपा के लिए आत्ममंथन तो कांग्रेस की ‘उधारी की बैसाखी’ पर उछलकूद!

✍️ अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर।
तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों पर हुए हालिया उपचुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति में एक बार फिर चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। जहां इन नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कुछ सीटों पर अपनी चुनावी रणनीति की ‘समीक्षा’ करने पर मजबूर किया है, वहीं कांग्रेस और विपक्ष के नेता बैसाखियों के सहारे मिली जीत को भी अपनी ‘महान लहर’ बताने में जुट गए हैं। आइए समझते हैं तीनों राज्यों का पूरा सियासी समीकरण और नेताओं के दावों की जमीनी हकीकत।

दतिया
जंतर-मंतर के फेर में फंसी भाजपा, बैसाखी के दम पर उछलती कांग्रेस

दतिया उपचुनाव के नतीजों को लेकर कांग्रेस खेमा ऐसे जश्न मना रहा है मानो उन्होंने पूरा मध्य प्रदेश ही फतह कर लिया हो। पीसीसी चीफ जीतू पटवारी की पीठ थपथपाई जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। भाजपा के लिए दतिया एक बड़ा सबक है। कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देने की अंदरूनी नाराजगी और जनता की नब्ज भांपने में हुई चूक भारी पड़ी। आशुतोष तिवारी (60,741 वोट) ने लड़ाई तो लड़ी, लेकिन भीतरघात और असंतोष ने खेल बिगाड़ दिया। कांग्रेस के घनश्याम सिंह (66,757 वोट) जीते जरूर हैं, लेकिन यह जीत कांग्रेस की अपनी ताकत से ज्यादा ‘तीसरे कोण’ की उधारी है। मैदान में उतरी आजाद समाज पार्टी (ASP) के दामोदर यादव ने 22,527 वोट काटकर सीधे तौर पर भाजपा का गणित बिगाड़ दिया। अगर यह तीसरा समीकरण न होता, तो कांग्रेस की चुनावी नैया बीच मंझधार में ही डूब जाती। महज 6,016 वोटों के अंतर से मिली इस ‘इत्तफाक वाली जीत’ पर कांग्रेस नेताओं का अति-उत्साह हास्यास्पद नजर आता है।

बांकीपुर
सुशासन के सामने लालटेन गुल, प्रशांत किशोर का ‘जंतर-मंतर’ असर

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर तो कांग्रेस और राजद (RJD) का सूपड़ा ही साफ होता दिख रहा है। एनडीए (NDA) और भाजपा के मजबूत आधार के सामने विपक्ष यहां पूरी तरह पस्त नजर आया। यहां सबसे बड़ा झटका उन नेताओं को लगा है जो खुद को बिहार की राजनीति का नया मसीहा मान रहे थे। जन सुराज के प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक बढ़त ने राजद और कांग्रेस के ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण का जंतर-मंतर ही गायब कर दिया है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल यहां मुकाबले से बाहर होकर सिर्फ तमाशा देखने को मजबूर हैं। नीरज कुमार (भाकपा) और रेखा गुप्ता (अन्य) के वोट शेयर को देखें, तो साफ है कि जनता ने वंशवाद और खोखले वादों को सिरे से नकार दिया है।
गुजरात मोदी के गढ़ में विपक्ष की करारी शिकस्त, ‘सत्येंद्र’ का डंका

गुजरात हमेशा की तरह भाजपा का वो अभेद्य किला साबित हुआ है, जहां कांग्रेस के बड़े-बड़े दावों की हवा निकल जाती है। मंजलपुर विधानसभा सीट पर भाजपा के सत्येंद्रभाई (सतीश) पटेल ने 30,499 से अधिक वोटों के भारी अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। यह नतीजा साफ करता है कि संगठन और विकास के मामले में भाजपा का कोई तोड़ नहीं है। कांग्रेस के भीखाभाई रबारी मात्र 24,585 वोटों पर सिमट कर रह गए। मतदान का प्रतिशत (37.05%) भले ही कम रहा हो, लेकिन जितने भी वोट पड़े, उसमें जनता ने कांग्रेस को उसकी असली जगह दिखा दी। गुजरात में ईवीएम का रोना रोने वाले कांग्रेसी नेताओं के पास इस करारी शिकस्त का कोई जवाब नहीं है। बैसाखियों का जश्न ज्यादा दिन नहीं चलता तीनों राज्यों के इन उपचुनावों का सार यही है कि भाजपा को जहां स्थानीय स्तर पर टिकट वितरण और सांगठनिक असंतोष (जैसे दतिया में) की समीक्षा करने की जरूरत है, वहीं कांग्रेस को आत्ममुग्धता से बाहर आना चाहिए। दतिया में मिली ‘बाय चांस’ जीत को अपनी पीठ थपथपाने का जरिया बनाने वाले कांग्रेसी नेता यह भूल रहे हैं कि बिहार और गुजरात में जनता ने उन्हें पूरी तरह से नकार दिया है। तीसरे दलों के सहारे मिली जीत से नेता भले ही अपनी साख बचाने की कोशिश करें, लेकिन देश की सजग जनता सब समझती है।