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Eid-ul-Adha Special: कुर्बानी का क्या है असली अर्थ? बिना मांस के कैसे मनाते हैं शाकाहारी मुसलमान यह त्योहार

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दुनियाभर में मुसलमान अपना सबसे खास त्योहार ‘इद-उल-अजहा’ (बकरीद) मनाने की तैयारियों में जुटे हैं। जहाँ सऊदी अरब और खाड़ी देशों में कुर्बानी 27 मई को है, वहीं भारत और अन्य एशियाई देशों में यह 28 मई को मनाई जा रही है। यह त्योहार हजरत इब्राहिम के अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास और उनके हुक्म के आगे सर झुकाने की याद में मनाया जाता है। त्योहार के दौरान पशु की कुर्बानी देने की परंपरा है, जिसे लोग मिल-बांटकर खाते हैं। हालांकि, एक महत्वपूर्ण सवाल अक्सर सामने आता है कि जो मुसलमान शाकाहारी (Vegetarian) हैं, वे इस त्योहार को कैसे मनाते हैं?

📈 शाकाहारी मुसलमानों की बढ़ती संख्या

प्यू रिसर्च और अन्य सर्वेक्षणों के अनुसार, दुनिया के कई देशों में शाकाहारी मुसलमानों की संख्या में वृद्धि हुई है। भारत में लगभग 8 प्रतिशत मुसलमान खुद को शाकाहारी मानते हैं, जो मांस या मछली का सेवन नहीं करते। इसी तरह, सऊदी अरब, इंडोनेशिया और तुर्की जैसे मुस्लिम बहुल देशों में भी शाकाहारी और वीगन जीवनशैली अपनाने वाले मुसलमानों की एक बड़ी आबादी मौजूद है, जो स्वास्थ्य, नैतिकता या पशु प्रेम के कारण इस राह को चुन रहे हैं।

🤲 शाकाहारी मुसलमान कैसे मनाते हैं बकरीद?

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, शाकाहारी मुसलमान ईद-उल-अजहा के दिन कुर्बानी की पारंपरिक प्रक्रिया में सीधे शामिल नहीं होते। उनके लिए इस त्योहार का अर्थ ‘त्याग और दान’ है। ब्रिटेन की आयशा यूनुस हों या बेरूत की फौजिया, इन सभी का मानना है कि त्योहार का सार यह है कि श्रद्धालु अपने लिए मूल्यवान किसी चीज का त्याग करे और जरूरतमंदों की मदद करे।

✨ दान और मानवता ही त्योहार का मूल संदेश

शाकाहारी मुसलमान बकरीद के दिन नए कपड़े पहनते हैं, दोस्तों और परिवार के साथ शुद्ध शाकाहारी दावत बनाते हैं और गरीबों की सहायता के लिए बढ़-चढ़कर दान करते हैं। इस्तांबुल की जहरा के शब्दों में, “कुर्बानी का अर्थ सिर्फ पशु की बलि देना नहीं, बल्कि अपनी प्रिय वस्तु का त्याग कर दूसरों के जीवन में खुशहाली लाना है।” शाकाहारी मुसलमान इसी भावना को अपनाकर ईद की खुशियों को दोगुना करते हैं, जो मानवता और सेवा के संदेश को पुख्ता करता है।

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