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Chardham Yatra 2026: केदारनाथ के बाद बद्रीनाथ धाम के खुले कपाट, जानें क्यों कहते हैं इसे धरती का वैकुंठ?

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Badrinath Dham Door Opened: उत्तराखंड की पवित्र वादियों में एक बार फिर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है. बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा 2026 अब पूरी तरह से गति पकड़ चुकी है. इससे पहले अक्षय तृतीया के दिन यमुनोत्री धाम और गंगोत्री धाम के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोले गए थे, जबकि 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुलते ही भक्तों का उत्साह चरम पर पहुंच गया था. अब बद्रीनाथ धाम के खुलने के साथ ही यह दिव्य चारधाम यात्रा पूर्ण रूप से प्रारंभ हो चुकी है.

फूलों की खुशबू से महका बद्रीविशाल का दरबार

इस पावन अवसर के लिए बद्रीनाथ मंदिर को करीब 25 क्विंटल फूलों से बेहद भव्य तरीके से सजाया गया था. गेंदे और अन्य विदेशी फूलों की महक के बीच कपाट खुलने की प्रक्रिया पूरी की गई. कपाट खुलने के साथ ही अब देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालु अगले छह महीनों तक भगवान विष्णु के इस स्वरूप के दर्शन कर सकेंगे.

क्यों कहा जाता है इसे धरती का वैकुंठ?

बद्रीनाथ धाम को धरती का वैकुंठ कहा जाना केवल एक मान्यता नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था और पौराणिक कथाओं से जुड़ा विश्वास है. शास्त्रों में बद्रीनाथ धाम को धरती का वैकुंठ यानी भगवान विष्णु का पृथ्वी पर निवास माना गया है. मान्यता है कि सतयुग में भगवान विष्णु ने यहां कठोर तपस्या की थी. यह स्थान उन्हें इतना प्रिय है कि इसे उनका साक्षात निवास स्थान माना जाता है. शास्त्रों में कहा गया है, आकाश, पृथ्वी और पाताल में अनेकों तीर्थ हैं, परंतु बद्रीनाथ जैसा कोई तीर्थ न पहले था और न कभी होगा. यहां के दर्शन मात्र से जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है. पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु तपस्या कर रहे थे, तब माता लक्ष्मी ने उन्हें धूप और वर्षा से बचाने के लिए बदरी (बेर) के पेड़ का रूप धारण कर लिया था. माता के इस समर्पण के कारण इस स्थान का नाम बद्रीनाथ पड़ा.

बद्रीनाथ धाम का महत्व

चारधामों में बद्रीनाथ धाम का स्थान बहुत विशेष माना जाता है. यह धाम अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है और हिमालय की गोद में बसा यह तीर्थ स्थल आत्मिक शांति का अद्भुत अनुभव कराता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार,बद्रीनाथ धाम के दर्शन से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. यह स्थान 108 दिव्य वैष्णव तीर्थों में शामिल है, जिसे दिव्य देशम भी कहा जाता है. आदि शंकराचार्य ने इस धाम को पुनर्जीवित कर इसे प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित किया था, जिससे इसकी महत्ता और भी बढ़ गई.

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