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डॉग बाइट,प्रतिदिन 200 शिकार,इंदौर नगर निगम में लाखों रुपयों की बंदरबांट के बाद कागजों पर दौड़ते नसबंदी के घोड़े।

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डॉग बाइट,रोजाना 200 लोग शिकार,कागजों पर नसबंदी,लगातार बढ़ती आवारा श्वान की संख्या,नगर निगम के जिम्मेदार बुराई ढोल रहे एकदूसरे पर।

✍️ अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार इंदौर

 

इंदौर शहर का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां डॉग बाइट की घटनाएं न हो रही हो। जबकि रोजाना अलग अलग अस्पतालों में श्वानों के शिकारों का आंकड़ा 200 हैं। जो चौंकाने वाला हैं। क्योंकि मॉर्निंग वॉक, इवनिंग वॉक,अन्य जरूरी कार्यों से निकलने वाली आमजनता डॉग बाइट का शिकार हो रही हैं। जिसके पूरी तरह से जिम्मेदार इंदौर नगर निगम के वो जिम्मेदार अधिकारी,नेता हैं। जो वक्त आने पर बड़े बड़े खोखले दावों के अलावा कुछ नहीं करते हैं। क्योंकि जमीनी हकीकत यह है कि नगर निगम के लाखों करोड़ों रुपयों को पानी में बहाया जा रहा हैं। लेकिन नतीजा कोई काम का नहीं हैं। क्योंकि कागजों पर दौड़ते इन आंकड़ों की वजह से शहरवासी और आवारा श्वान दोनों ही परेशान हैं। जिसकी वजह से श्वान आम लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं।

 

कागजी घोड़े है दौड़ रहे हैं।

पशुप्रेमी बनते हुए कुछ NGO और इनसे जुड़े लोगों ने उक्त पूरी प्रक्रिया में सिर्फ अपनी जेबें भरी हैं। तो नेताओं के भी जेब भरे गए हैं। सूत्र बताते है कि आवारा श्वान की नसबंदी के नाम पर करोड़ो रुपए डकारे हुए हैं। लेकिन जमीनी तौर पर इन करोड़ों रुपयों का कोई भी उपयोग सही और सटीक प्रक्रिया में नहीं किया गया है।

 

 

जमीनें हथियाई,काम अपना नाम श्वानों का।

आवारा श्वान के नाम पर शहर की कुछ NGO संस्थाओं ने मिलीभगत करते हुईं मात्र सरकारी जमीनें तो हथिया ली हैं। लेकिन आवारा श्वान को लेकर अब उनका कोई सार्थक रुख नहीं हैं। उन्हें यूं ही शहर की सड़कों पर विचरण करने के लिए छोड़ दिया गया हैं। जहां उनके खाने पीने रहने की कोई भी व्यवस्थाएं नहीं हैं। जो कि उच्चतम न्यायालय के आदेशों की भी अवहेलना हैं। खैर फिलहाल यह कहना गलत नहीं होगा कि आवारा श्वानों के नाम पर तथाकथित लोग सिर्फ अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। लेकिन श्वान के लिए कुछ कर नहीं रहे हैं। हां जरूर समय समय पर ऐसे तथाकथित लोग बिल से बाहर निकलते है वह भी अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए बस।

नसबंदी हुई तो पिछले चार सालों में क्यों बढ़ गई संख्या।

इंदौर नगर निगम ने NGO संस्था को नसबंदी की जिम्मेदारी देते हुए करोड़ों रुपया भी बर्बाद किया। लेकिन NGO संस्था के ये आंकड़े मात्र कागजों तक ही सीमित रहे हैं। क्योंकि पिछले चार सालों की तुलना की जाए तो नसबंदी मात्र कागजों पर हुई हैं और उसके एवज में लाखों रुपयों की बंदरबांट। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि श्वानों की संख्या बढ़ती ही रही हैं। हालांकि इंदौर नगर निगम के जिम्मेदारों की नौटंकियों की वजह से जरूर आवारा श्वानों का जीना दूभर हुआ हैं। उनके जीवन में आई उथल पुथल की वजह से वह हिंसक हो रहे हैं।

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