HoFF Appointment Controversy: सीनियर को छोड़ जूनियर को कैसे बना दिया हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स? CAT ने सरकार से मांगा जवाब
जबलपुर : कनिष्ठ अधिकारी को हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स नियुक्ति किए जाने के मामले में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में सोमवार को सुनवाई हुई. नियुक्ति को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश के सबसे वरिष्ठ भारतीय वन सेवा के अधिकारी ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में याचिका दायर की थी.
जूनियर अधिकारी को बना दिया हेड ऑफ फोर्सेज
याचिकाकर्ता हिदायत उल्ला खान की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि वह साल 1989 भारतीय वन सेवा के अधिकारी हैं. प्रदेश के सबसे वरिष्ठ आईएफएस (IFS) अधिकारी होने के बावजूद भी उनसे जूनियर अधिकारी शुभ रंजन सेन को मध्य प्रदेश राज्य में हेड ऑफ फाॅरेस्ट फोर्सेज के तौर पर नियुक्त किया गया है. चयनित अधिकारी वरिष्ठता सूची में पांचवें नंबर 5 में आते हैं और साल 1991 के आईएसएस अधिकारी हैं.
सीनियर की परफॉर्मेंस व वरिष्ठता दरकिनार करने के आरोप
याचिका में कहा गया था कि याचिकाकर्ता का पिछले पांच सालों की एनुअल परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट (एपीएआर) आउटस्टैंडिंग थी. इसके बावजूद भी उनकी उनकी सीनियरिटी को नजरअंदाज करते हुए विगत 28 फरवरी 2026 को अनावेदक शुभ रंजन सेन को हेड ऑफ फाॅरेस्ट फोर्सेज पद पर नियुक्त करने के आदेश जारी कर दिए गए. उनकी नियुक्ति के आदेश अप्रैल 2009 को जारी गाइडलाइन के विपरीत हैं. आवेदन में आरोप लगाया गया है कि बाहरी वजहों से उन्हें हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्सेज पद पर नियुक्ति किया गया है.
किन बाहरी कारणों से दी गई नियुक्ति, अधिकरण ने मांगा जवाब
याचिका में कहा गया था कि किन बाहरी कारणों से जूनियर अधिकारी को नियुक्ति प्रदान की गई इसकी जांच होनी चाहिए. इस मामले में अधिकरण ने याचिका की सुनवाई करते हुए केंद्रीय प्रमुख सचिव वन विभाग,चयन समिति तथा चयनित जूनियर अधिकारी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने आवेदन की सुनवाई के बाद अनावेदको को नोटिस जारी किया है. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता उत्कृष्ट अग्रवाल ने पैरवी की.
25 साल बाद बुकिंग क्लर्क को मिला न्याय
वहीं, जबलपुर हाईकोर्ट ने 25 साल पुराने एक मामले में फैसला देते हुए रेलवे के बुकिंग क्लर्क को बड़ी राहत दी है. रेलवे में नौकरी के दौरान एक बुकिंग क्लर्क को महज 10 रुपए अधिक लेने के आरोप में विजिलेंस ने पकड़कर कार्रवाई कर दी थी. इस मामले में बुकिंग क्लर्क ने तर्क दिया था कि जिस वक्त ये हुआ, उस वक्त काउंटर पर बहुत भीड़ थी और भूलवश 10 रु ज्यादा ले लिए होंगे. लेकिन विजिलेंस ने बिना तर्क सुने उनपर कार्रवाई की और रेलवे से बर्खास्त कर दिया गया. जनवरी 2001 के इस मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बुकिंग क्लर्क नारायण नायर के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि विभागीय जांच निष्पक्ष होनी चाहिए थी. इसके साथ ही कोर्ट ने विजिलेंस की कार्रवाई को गलत बताया.
Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.