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मामला स्कीम 78 का,IDA संपदा शाखा,नगर निगम भवन अनुज्ञा की मिलीभगत,20 सालों बाद स्वीकृत नक्शे पर चल रहा खेल।

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आईडीए की संपदा शाखा और इंदौर नगर निगम बीओ बीआई की मिलीभगत

मामला स्कीम 78 का

भूखंड है नहीं, 20 साल बाद मकानों के नक्शे नगर निगम से पास करवाकर लीज नवीनीकरण,फ्री होल्ड का हो रहा खेल। 

✍️ अमित कुमार त्रिवेदी पत्रकार 

इंदौर विकास प्राधिकरण की संपदा शाखा एक बार फिर चर्चाओं में हैं। दरअसल संपदा शाखा से खुद सीईओ आर पी अहिरवार भी तंग आ गए हैं। और वह समय समय पर कई बार संपदा अमले को फटकार लगाते देखे जा सकते हैं। लेकिन फिर भी संपदा शाखा अमला सुधरने का नाम नहीं ले रहा हैं। इधर नगर निगम का भवन अनुज्ञा विभाग भी इस पूरे खेल में शामिल हैं। क्योंकि संपदा शाखा और नगर निगम की मिलीभगत  का ऐसा ही एक और कारनामा  न्यूज with तड़का के पास लगा है। जिसके आधार पर कहना गलत नहीं होगा कि संपदा और नगर निगम  में सबकुछ हो सकता हैं। बस आप में दम होना चाहिए काम करवाने का। दरअसल हम बात कर रहे है स्कीम 78 की। जहां फिलहाल अब कोई भी भूखंड रिक्त नहीं हैं। लगभग सभी पर मकान दुकान तक बन चुके हैं। लेकिन अब 20 सालों बाद नगर निगम भवन अधिकारी और भवन निरीक्षक की साठगांठ के चलते इंदौर विकास प्राधिकरण से बिंदास लीज नवीनीकरण हो रही है, तो साथ ही लीज फ्री होल्ड तक हो जाती हैं। लेकिन ida के स्पॉट रिपोर्ट देने वाले,फील्ड रिपोर्ट देने वालों की सेवा हो जाने पर यह मामला दब जाता हैं। कभी प्रकाश में ही नहीं आता हैं। 

यह है मामला 

दरअसल मामला कुछ यूं है कि आईडीए की स्कीम 78 में इंदौर विकास प्राधिकरण ने प्लाट आवंटित किए सालों हो गए हैं। लेकिन तत्कालीन उस समय लोगों ने बिना नक्शा पास करवाए ही मकान दुकान तान दिए। लेकिन नगर निगम से वह नक्शा स्वीकृत करवाना भूल गए थे। अब IDA से स्कीम 78 के लोगो को लीज नवीनीकरण, फ्री होल्ड जैसी प्रक्रिया के लिए नगर निगम से स्वीकृत नक्शे की आवश्यकता होती हैं। लिहाजा नगर निगम भवन अधिकारी और भवन निरीक्षक 20 साल मकान लगभग जर्जर होने की स्थिति होने के बाद उसी भूखंड पर नया नक्शा स्वीकृत कर रहा हैं। ताकि IDA में इन लोगों का काम नहीं रुके। इसमें IDA की संपदा शाखा का भी पूरा योगदान और सहयोग है जिसकी वजह से कोई व्यवधान नहीं आता हैं। 

शाखा के फील्ड रिपोर्ट प्रस्तुतकर्ता जवाबदेह

इस पूरे मामले में IDA मुख्यालय के संपदा शाखा के बाबू तो जिम्मेदार है ही सही। लेकिन इस खेल सबसे अहम भूमिका IDA के ही वह उपयंत्री,यंत्री,सब इंजीनियर की प्रमुख भूमिका हैं। जो संपदा शाखा के अनुसार फील्ड पर जाकर रिपोर्ट बनाते हैं। और IDA में प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि उनकी आंखों किस कागज की पट्टी बांध दी जाती हैं कि उन्हें बना बनाया मकान दिखने की बजाय भूखंड दिख रहा हैं। 

होनी चाहिए जांच नपेंगे घोटालेबाज। 

इधर इस पूरे मामले से यह साफ तो हो गया कि उक्त मामले में झोल ही झोल हैं। लिहाजा अब ऐसे मामले की जांच होती है तो नगर निगम,IDA संपदा शाखा के कई चेहरे नपेंगे जो सफेद कॉलर दिखाते हैं। क्योंकि वह IDA के नियम कायदों का मजाक बना रहे है और राजस्व की हानि भी पहुंचा रहे हैं।

यह भूखंड जिनकी जांच से खुल जाएगी पोल।

स्कीम 78 के प्लाट नंबर 213 और 315 जैसे दर्जनों भूखंड क्रमांक हैं जिनकी जांच होती है तो सबकुछ सच्चाई सामने आ जाएगी।

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