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TVK Controversy: टीवीके विवाद के बीच क्यों चर्चा में आया ‘बोम्मई जजमेंट’? जानें क्या है राजभवन और फ्लोर टेस्ट का पूरा मामला

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तमिलनाडु के संदर्भ में टीवीके (तमिलगा वेत्री कजगम -टीवीके) को ना बुलाने (या सत्ता हस्तांतरण में नजरअंदाज करने) पर 1994 में आए एसआर बोम्मई फैसले का अर्थ यह है कि राज्यपाल की व्यक्तिगत राय के बजाय बहुमत का परीक्षण केवल विधानसभा के पटल यानी फ्लोर टेस्ट पर होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता व संविधानविद् संजय हेगड़े, केसी कौशिक, अभिषेक राय, अनुपम मिश्रा व ग्यानंत सिंह के मुताबिक एसआर बोम्मई फैसला स्पष्ट करता है कि बहुमत का फैसला राज्यपाल के चैंबर में नहीं, बल्कि विधानसभा के फ्लोर टेस्ट में होगा. यदि किसी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है या कोई नई पार्टी, जैसे TVK) दावा करती है, तो राज्यपाल उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते.

संविधानविदों के मुताबिक यदि टीवीके या कोई अन्य राजनीतिक दल यह साबित कर सकता है कि उसके पास विधानसभा में बहुमत है, तो राज्यपाल को सरकार बनाने का मौका देना चाहिए.

वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना ये है कि फैसले का निष्कर्ष स्पष्ट करता है कि यदि तमिलनाडु में कोई राजनीतिक स्थिति उत्पन्न होती है और TVK को एक महत्वपूर्ण दावेदार के रूप में ना बुलाकर अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) लगाया जाता है या किसी अन्य को मौका दिया जाता है, तो बोम्मई फैसले के अनुसार यह संवैधानिक रूप से गलत हो सकता है.

क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का एसआर बोम्मई फैसला-

सन् 1994 में सर्वोच्च अदालत की नौ जजों की संवैधानिक बेंच ने एक निर्णय दिया था, जिसे एसआर बोम्मई बनाम भारत सरकार मुक़दमा कहा जाता है. इस निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि राज्य सरकारों को मनमाने तरीके से बर्खास्त नहीं किया जा सकता है. मामला कर्नाटक विधानसभा का था, जब 1985 में जनता दल ने यहां सरकार बनाई थी.

इस दौरान रामकृष्ण हेगड़े को सीएम बनाया गया था, हालांकि 1988 में हेगड़े को हटाकर एसआर बोम्मई को मुख्यमंत्री बना दिया गया. इस फैसले से नाराज होकर करीब 19 विधायकों ने एक साथ पार्टी छोड़ दी और बोम्मई सरकार से समर्थन वापस ले लिया.

विधायकों के समर्थन वापस लिए जाने के तुरंत बाद अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर राज्यपाल ने सरकार को बर्खास्त कर दिया और राष्ट्रपति शासन लगा दिया. तब बोम्मई ने राज्यपाल से कहा कि वो विधानसभा में बहुमत परीक्षण (फ्लोर टेस्ट) करवाए, लेकिन राज्यपाल ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया. बोम्मई इस मामले को लेकर हाईकोर्ट पहुंच गए और फैसला उनके खिलाफ आया.

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया. सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल के पास किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने की शक्ति पूर्ण नहीं है. यह संविधान की सीमाओं के अधीन है जिसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा में होना चाहिए यानी फ्लोर टेस्ट किया जाना चाहिए कि किस दल के पास बहुमत है. चाहे वह अकेले का हो या फिर कई दलों का मिलाकर एक गठबंधन.

इस फैसले के बाद से ही किसी भी सरकार को बर्खास्त करने से पहले विधानसभा में वोटिंग जरूरी हो गया, जिसे हम सब फ्लोर टेस्ट के नाम से जानते हैं. इस फैसले से राज्य सरकारों के अधिकारों की रक्षा हुई और अब मनमाने तरीके से किसी भी सरकार को नहीं गिराया जा सकता है, जब तक कि वो विधानसभा में हुए फ्लोर टेस्ट में पास या फेल नहीं हो जाती.

फैसले का प्रभाव

  1. बहुमत का परीक्षण सिर्फ फ्लोर टेस्ट पर- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी राज्य सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसका फैसला राज्यपाल के राजभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल या फ्लोर टेस्ट होना चाहिए.

  1. न्यायिक समीक्षा-फैसले में कहा गया कि राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 356 के तहत सरकार को बर्खास्त करने का फैसला अंतिम नहीं है. अदालत इस बात की जांच कर सकती है कि राष्ट्रपति शासन लगाने के पीछे आधार (राज्यपाल की रिपोर्ट) तर्कसंगत, निष्पक्ष और संवैधानिक है या नहीं.

  1. सरकार की बहाली- अगर सर्वोच्च न्यायालय यह पाता है कि राष्ट्रपति शासन गलत तरीके से लगाया गया था, तो वह बर्खास्त की गई राज्य सरकार को बहाल कर सकती है.
  2. मूल ढांचा- सुप्रीम कोर्ट ने घोषित किया कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है. यदि कोई राज्य सरकार धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ काम करती है, तो उसे अनुच्छेद 356 के तहत हटाया जा सकता है.

  1. विधानसभा का विघटन नहीं, सिर्फ निलंबन -राष्ट्रपति शासन लागू होने पर विधानसभा को तुरंत भंग नहीं किया जा सकता, उसे केवल निलंबित किया जा सकता है. संसद के दोनों सदनों द्वारा राष्ट्रपति शासन की पुष्टि होने के बाद ही विधानसभा को भंग किया जा सकता है.

बता दें कि टीवीके अध्यक्ष प्रेसिडेंट विजय ने गुरुवार को लगातार दूसरे दिन लोक भवन में गवर्नर राजेंद्र आर्लेकर से मुलाकात की और तमिलनाडु में सरकार बनाने पर 40 मिनट से ज्यादा देर तक डिटेल में बातचीत की.

राज्यपाल ने विजय से बहुमत (118 विधायक) का प्रमाण देने की अपनी रिक्वेस्ट दोहराई, ताकि वह उन्हें ऑफिशियली सरकार बनाने के लिए इनवाइट कर सकें.

विजय से मुलाकात के बाद क्या बोले राज्यपाल?

लोक भवन ने एक बयान में कहा, “मीटिंग के दौरान,राज्यपालने बताया कि तमिलनाडु लेजिस्लेटिव असेंबली में सरकार बनाने के लिए जरूरी मेजॉरिटी सपोर्ट अभी तक नहीं मिला है.”

विजय, जिनकी टीवीके ने अपने पहले चुनावी मुकाबले में शानदार परफॉर्म किया और 108 सीटें हासिल कीं, सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन सरकार बनाने के लिए मेजॉरिटी से चूक गई.

कांग्रेस, जिसने पांच सीटें जीती थीं, ने विजय को सपोर्ट दिया है, लेकिन टीवीके को मेजॉरिटी पक्का करने के लिए अभी भी पांच और विधायकों के सपोर्ट की जरूरत होगी. सूत्रों ने बताया कि विजय और TVK के सीनियर नेताओं ने गवर्नर को बताया कि उन्हें कांग्रेस से कितना सपोर्ट मिला है और सरकार बनाने के लिए और सपोर्ट मिलने की संभावना है.

विजय, जो तिरुचिरापल्ली ईस्ट और पेरम्बूर सीटों से जीते थे, ने बुधवार को 113 विधायकों के सपोर्ट लेटर जमा किए थे, जिनमें पांच कांग्रेसी विधायक भी शामिल थे जिन्होंने ऑफिशियली टीवीके को सपोर्ट किया था.

कपिल सिब्बल ने राज्यपाल के फैसले पर उठाए सवाल

दूसरी ओर,राज्यसभा सांसद और सीनियर एडवोकेट, कपिल सिब्बल ने कहा, “इस समय, किसी एक पार्टी के पास मेजॉरिटी नहीं है. इसलिए, आम तौर पर, सबसे बड़ी पार्टी को, भले ही उसके पास मेजॉरिटी न हो, सरकार बनाने के लिए कहा जाना चाहिए… गवर्नर यह टेस्ट नहीं कर सकते कि किसके पास मेजॉरिटी है, और उन्हें सबसे बड़ी पार्टी और उस पार्टी के लीडर को आकर सरकार बनाने के लिए कहना होगा.”

उन्होंने कहा कि फिर वह TVK को हाउस में अपनी मेजॉरिटी दिखाने के लिए समय देंगे… गवर्नर समय लेना चाहते हैं और यह पक्का करना चाहते हैं कि BJP चुनावी प्रोसेस में हेरफेर कर सके और किसी तरह TVK को सरकार बनाने से रोक सके.

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